अनेक लोग अपने पुत्रकी, जो या तो कोई मनोरोगी होता है या किसी व्यसनका दास होता है, उसका विवाह किसी युवतीसे करा देते हैं कि विवाहके पश्चात उसमें अपेक्षित सुधार आ जाएगा; किन्तु ऐसे माता-पिता यह नहीं समझते हैं कि वे ऐसा करके एक स्त्रीका जीवन नारकीयकर, पापके भागी बनते हैं । जिस पुत्रको उन्होंने जन्म दिया उसे यदि वे योग्य मार्ग नहीं दिखा सके तो एक पराये घरसे आई स्त्री, जो उस व्यक्तिको जानती तक नहीं है, उसे अकस्मात कैसे सुधार सकती है ? – तनुजा ठाकुर
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