विद्यार्थियोंको क्यों सिखाई जाए स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – ४)


सुखी गृहस्थ जीवन हेतु बाल्यकालमें दोषनिर्मूलन प्रक्रियाको अंगीकृत करवाना आवश्यक : आजका विद्यार्थी ही कलका गृहस्थ बनता है । यदि ब्रह्मचर्य आश्रममें (विद्यार्थी जीवनमें) दोष निर्मूलन प्रक्रिया सिखाई जाए तो ऐसे विद्यार्थियोंका जीवन सुखी होगा और वे अच्छे पति या पत्नी, माता या पिता, दादा या दादी सिद्ध होंगे ।
वर्तमान कालमें अधिकांश युवक या युवती जैसे ही वैवाहिक जीवनमें प्रवेश करते हैं, उनमें अनेक प्रकारके वैचारिक मतभेद आरम्भ हो जाते हैं, जो स्वाभाविकभी है; क्योंकि वे दो भिन्न कुलों एवं संस्कारोंमें पले होते हैं; किन्तु समस्या तब भयावह रूप ले लेती है, जब दोनोंमेंसे कोई भी परेच्छासे कुछ भी करनेको या किसी भी प्रसंगमें झुकनेको सिद्ध नहीं होते हैं, जबकि विवाह रूपीसंस्था परेच्छाको अंगीकृत करनेका सुन्दर माध्यम है और इससे अहंको न्यून करनेमें सहायता मिलती है । आज भारत जैसे सुसंस्कृत देशमें सम्बन्ध विच्छेद बढनेका मुख्य कारण साधकत्वका अभाव है । स्वार्थी और अहंकारी व्यक्तियोंका वैवाहिक जीवन कभी सुखी नहीं हो सकता है; क्योंकि गृहस्थ जीवनको एक आश्रमकी संज्ञा दी गई है और आश्रम जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत करने हेतु त्याग और विनम्रता, इन दोनों गुणोंका होना परम आवश्यक होता है, यह छोटी सी और महत्त्वपूर्ण बात न तो आजके माता-पिता और न ही आजकी निधर्मी शिक्षण व्यवस्था, विद्यार्थियोंको सिखा पाते हैंं; परिणामस्वरूप आजका उच्च शिक्षित व्यक्ति हो या अल्पशिक्षित, सभी अपने जीवनमें पग-पगपर अपने दोषों और अहंकारके कारण ठोकर खाते हैं एवं दुःखी होते हैं । स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियासे व्यक्ति अन्तर्मुखी बनता है एवं वह दिव्य गुणोंको आत्मसात करने हेतु सतत प्रयास करता है ।


जो भी विद्यार्थी स्वभावदोष निर्मूलनकी प्रक्रिया सीखना चाहते हैं वे हमारे व्हाट्सऐप्प गुट ‘आरुणि’, जो विद्यार्थियोंके लिए ही आरम्भ किया गया है, उसमें जुड सकते हैं; इस हेतु आश्रमके सम्पर्क सूत्रपर अपना सन्देश भेजें ।



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