विद्यार्थीको अधिकारके स्थानपर उसके कर्तव्यका बोध कराने हेतु दोष निर्मूलन आवश्यक : हमारे श्रीगुरुने एक बार बहुत अच्छी बात कही थी कि साधकका कोई अधिकार नहीं होता, मात्र कर्तव्य होता है । आज यदि समाजका प्रत्येक विद्यार्थी, इस तथ्यको बाल्यकालमें ही अंगीकृत कर ले तो इस समाजका कायाकल्प हो जाए, किन्तु आज सभीको मात्र अपने अधिकार ज्ञात हैं, कर्तव्य ज्ञात होते हुए भी वे इसका पालन नहीं करते हैं । यदि हम बाल्यकालसे ही विद्यार्थीमें कर्तव्य पालनका संस्कार डालें तो क्या वह वृद्ध माता-पिताको कभी वृद्धाश्रममें छोडेगा ?, क्या वह अपनी पत्नी या पतिके प्रति तथा अपनी सन्तानोंके प्रति अपने कर्तव्यका त्याग कर, स्वयंके सुख हेतु सम्बन्ध विच्छेद कर दूसरेसे विवाह करेगा ? अहंकारी और स्वार्थी व्यक्ति दूसरे विवाहसे भी कहां सुख पाता है ? पाश्चात्य देशके लोग अनेक बार विवाह करते हैं; किन्तु सुख उन्हें प्राप्त नहीं होता; क्योंकि अहंकार और स्वार्थके कारण वे अपने किसी भी सम्बन्धको टिका कर नहीं रख पाते हैं; फलस्वरूप पशु समान अपने स्वार्थ और वासना तृप्ति हेतु अपना साथी परिवर्तित करते रहते हैं ।
अतः विद्यार्थियोंमें दिव्य गुण आत्मसात हों; इसलिए उन्हें दोष निर्मूलन प्रक्रिया सिखाना अनिवार्य है; किन्तु इस हेतु माता-पिता एवं शिक्षकोंको यह प्रक्रिया सर्वप्रथम स्वयं करनी होगी; क्योंकि बच्चे तो अनुकरणप्रिय होते हैं, वे बडोंको देखकर ही सीखते हैं ।
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