प्रजारक्षण हेतु आगामी भीषणकालकी पूर्व सिद्धता करनेकी अपेक्षा अपने राजपाट बचानेमें लिप्त हैं आजके राजनेता
अनेक सन्त बार-बार भावी विनाशकालकी भविष्यवाणी कर रहे हैं, ऐसेमें यदि हमारे राज्यकर्ताओंमें साधकत्व एवं प्रजाके प्रति पितृतुल्य स्नेह होता तो वे ऐसे द्रष्टा सन्तोंके चरणोंमें नतमस्तक होकर आगामी भीषणकालकी पूर्व सिद्धता हेतु प्रयास करते; किन्तु धर्म और साधनासे विमुख आजके राज्यकर्ता अपनी सत्ताको बनाए रखनेमें इतने व्यस्त हैं कि उन्हें सन्तों एवं द्रष्टाओंकी भविष्यवाणियोंका बोध ही नहीं हो रहा है । इसीको तो ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ कहते हैं । जबतक हमारी राजसत्ता, धर्मसत्ताके शरणागत थी, भारत सोनेकी चिडिया कहलाता था; किन्तु जबसे पाश्चात्योंकी विचारधारासे प्रभावित होकर हमारी राजनीति धर्मसे विमुख हुई है, तबसे इस देशका निरन्तर पतन हो रहा है । इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु धर्म अधिष्ठित राजनीतिक व्यवस्थाकी पुनः स्थापना करना अनिवार्य हो गया है और यह हिन्दू राष्ट्रके भारतमें आगमनसे ही साध्य हो सकता है ।
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