प्रारब्धके तीन प्रकार होते हैं, साधारण, मध्यम एवं तीव्र ! जहां साधारण प्रारब्ध अर्थात जब जीवनमें दुःखका प्रमाण अत्यल्प हो तो तीव्र साधना करनी चाहिए वहीं मध्यम प्रारब्ध अनुसार जब सब कुछ संघर्ष करनेपर प्राप्त होता हो तो ऐसेमें सन्त या गुरु कृपा पानेका प्रयास करना चाहिए । सन्त कृपासे प्रारब्ध सुसह्य हो जाता है, जीवनमें संघर्षकी तीव्रता घट जाती है एवं साधना होनेसे संचित भी नष्ट होने लगता है और जीव मुक्तिकी ओर बढता है ।अधिकांश जीव जीवनमें दुःखकी तीव्रता बढनेपर और बुद्धिके द्वारा उसे दूर करने हेतु सर्व प्रयासोंमें विफल होनेपर अपने दुखोंके मूल कारणको ढूंढनेके प्रयासके क्रममें ईश्वर उन्मुख होते हैं और साधना करनेपर जब उसकी उत्कंठा ईश्वर या धर्मको जाननेकी होती है और उस दिशामें योग्य प्रयास होते हैं तो उसे सन्तकी कृपा प्राप्त होती है और वह साधनामें सातत्य बनाते हुए अध्यात्मके उत्तरोतर चरणोंको साध्य करने लगता है ।(क्रमश:)
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