हमारे श्रीगुरुके अनुसार कलियुगमें व्यष्टि साधनाका ३० % एवं समष्टि साधनाका महत्त्व ७० % है और कलियुगके अन्तिम चरणतक रहेगा !
कलियुगमें समष्टि साधनाका इतना अधिक महत्त्व क्यों ? (भाग – ३)
कलियुगमें सर्व सामान्य मनुष्यकी वृत्ति तमोगुणी होगी, ऐसा हमारे द्रष्टा सन्तोंने अनेक धर्मग्रन्थोंमें कहा है । तमोगुणी व्यक्ति स्वार्थी होता है, वह अपने और अपने परिजनोंकी स्वार्थसिद्धिमें ही अधिकाधिक लिप्त रहता है । ऐसे स्वार्थी जीवोंकी संख्यामें वृद्धि होनेसे समाजकी स्थिति कैसी होती है ?, यह आपको बतानेकी आवश्यकता नहीं है । आज सभी अपने आसपासके लोगोंसे ही नहीं, अपितु अपने परिवारके सदस्योंके भी स्वार्थ रुपी दुर्गुणसे मात्र दुखी ही नहीं, अपितु पीडित हैं ! यह मात्र आपके घरकी स्थिति नहीं है, यहां तो कुएंमें ही भांग पडी है, स्वच्छ जल मिले तो मिले कैसे ?
भ्रष्टाचार, सम्बन्ध विच्छेद, वृद्धाश्रम, भिन्न प्रकारके अपराध जैसे अनेक सामाजिक कलंक, ऐसे ही स्वार्थ रुपी दुर्गुणोंंसे उपजी सामाजिक समस्याएं हैं । सिद्धान्त है कि जीव जितना स्वार्थी होता है, उस समाजमें उतनी ही अधिक समस्याएं होती हैं और समाजकी सबसे छोटी इकाई परिवार है । आज पारिवारिक जीवनमें कलह-क्लेश होनेका मूल कारण भी तो स्वार्थ ही है ! सामाजिक जीवन स्वस्थ रहे, इस हेतु समाजको साधक बनाना अति आवश्यक है एवं इस हेतु सभीको धर्म व आध्यात्मकी शिक्षा देनी आवश्यक होती है और इसीको समष्टि साधना कहते हैं
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