स्वयंकी रुचि-अरुचिको अत्यधिक प्रधानता देना, अपने मनके अनुसार वर्तन करना, धर्मकी अपेक्षा काम और अर्थको अधिक प्रधानता देना, अपनी अहंकी पुष्टिमें सदैव लित्प रहना, इन सबसे मनके संस्कार और तीव्र होते हैं एवं नूतन इच्छाओंका जन्म होता है; इससे जीवनमें कभी भी शान्ति एवं संतुष्टि नहीं आती है !
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