समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग – ६)


साधनाके प्रकार
साधनाके दो प्रकार हैं – व्यष्टि साधना और समष्टि साधना ।
व्यष्टि और समष्टि साधनाकी परिभाषा
जब कोई व्यक्ति स्वयंकी कोई वैयक्तिक इच्छापूर्ति हेतु या स्वयंकी आध्यात्मिक प्रगति हेतु साधना करता है तो उसे व्यष्टि साधना कहते हैं एवं जब समाजको धर्मके मार्गपर प्रवृत्त करने हेतु या समाजको सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणसे रक्षण करने हेतु साधना करता है, तो उसे समष्टि साधना कहते हैं ।

योग्य गुरुके मार्गदर्शनमें समष्टि साधना करनेका महत्त्व
खरे अर्थोंमें व्यष्टि एवं समष्टि साधना अर्थात दोनों ही प्रकारकी साधना करनेसे हमारी आध्यात्मिक प्रगति होती है एवं दोनों ही साधना एक दूसरेके पूरक भी हैं । हमारे श्रीगुरुके अनुसार व्यष्टि साधना अन्तर्गत, यदि कोई सामान्य गृहस्थ प्रतिदिन पूजा-पाठ, स्तोत्र-पठन, व्रत-त्योहार करना, देवालय अर्थात मन्दिर दर्शन, तीर्थक्षेत्र जाना इत्यादि कृतियां नियमित करता है तो एक जन्ममें उसकी १% आध्यात्मिक प्रगति हो जाती है; किन्तु यदि कोई व्यक्ति किसी योग्य गुरुके मार्गदर्शनमें व्यष्टि और समष्टि साधना करे तो एक वर्षमें ३ से ५% आध्यात्मिक प्रगति कर सकता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण परम पूज्य गुरुदेवके (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेके) मार्गदर्शनमें कार्य करनेवाली ‘सनातन संस्था’ है, जिसमें अभी तक ८० से अधिक साधक ‘सन्त पद’पर विराजमान हैं एवं १२०० से अधिक ‘जीवनमुक्त’ साधक हैं, जो साधना कर सन्त पदकी ओर अग्रसर हो रहे हैं ! ‘वैदिक उपासना पीठ’के भी साधक परम पूज्य गुरुदेवद्वारा प्रतिपादित आध्यात्मिक सिद्धान्तोंका पालन कर द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं । (१३.११.२०१८)



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