चूकें तीन स्तरोंपर होती हैं – वृत्ति (मनके स्तरपर), वाचा (बोलनेके स्तरपर) और कर्म (कृतिके स्तरपर), यदि आप अन्तर्मुख हैं तो आपको स्वयंको तीनों ही स्तरकी चूकें ध्यानमें आएंगी ! एक सामान्य व्यक्तिसे प्रतिदिन इन तीनों स्तरोंपर १५० से २०० चूकें होती हैं और ऐसा होनेपर भी यदि किसीको दो या तीन चूकें ही ध्यानमें आए तो समझ लें कि वृत्ति पूर्णत: बहिर्मुखी है ! आइए देखें, कुछ साधकोंद्वारा उनकी चूकें एवं उससे सम्बन्धित दोषोंके सम्बन्धमें किए गए निरीक्षण ! आप इन चूकों एवं दोषोंका अभ्यास अन्तर्मुख होकर करें और यह ध्यान दें कि कहीं आपसे भी इस प्रकारकी चूकें तो नहीं हो रही हैं ?
साधक अ
११.२.१८ की चूकें :
१. दूरभाषपर बीस मिनिट अनावश्यक समय व्यर्थ किया । दोष : समय व्यर्थ करना
२. शौचालयकी बत्ती जली छोड दी थी । दोष : सतर्कताका अभाव
३. पढाते समय अपनी पुत्रियोंपर चिल्लाई । दोष : क्रोध करना, संयम न रखना
४. वस्त्र पहनाते समय भी चार वर्षकी पुत्रीपर चिल्लाई । दोष : क्रोध करना
५. एक साधकको विलम्बसे उसके रुपए दिए । दोष : दूसरोंका विचार न करना
६. एक सह-साधककी चूक अयोग्य स्थानपर अयोग्य प्रकारसे सबके समक्ष बताई । दोष : चूकको योग्य प्रकारसे न बता पाना
साधक आ
दिनांक ११.२.१८ की चूकें :-
१. प्रातः विलम्बसे उठा, भ्रमण व योगाभ्यास नहीं किया, दोष-नियमबद्धता व समयबद्धताका अभाव
२: बार-बार बतानेपर भी स्नानगृहकी स्वच्छता नहीं की । दोष : अस्वच्छ रहना
३: अधपके चावल भोजनमें परोस दिए, जबकि हमें कई बार बताया गया है कि भोजन परोसनेसे पहले उसे चख लें; परन्तु हमसे तब भी यह चूक हुई । दोष: सीखनेकी प्रवृत्तिका न होना
४: रातको संगणकपर (कम्प्यूटरपर) सेवा करनेके पश्चात उसे बंद नहीं किया । दोष : सतर्कताका अभाव
साधक इ
दिनांक ११.०२.२०१८ की चूकें
१. प्रातः बिना नामजप किए शय्यासे उठ गई । दोष : अधीरतापूर्ण आचरण करना
२. प्रातः क्या अल्पाहार बनना है ?, इस विषयमें पूर्व नियोजन नहीं किया, जिससे सभीको अल्पाहार विलम्बसे मिला और मेरी नियोजित दिनचर्यामें भी विलम्ब हुआ। दोष : नियोजनका अभाव
३. कुछ विशेष पकवान बनाया और परिवारके किसी सदस्यके लिए उसे नहीं रखा । दोष : दूसरोंका विचार न करना
४. भोजन परोसते समय यह नहीं देखा कि तरकारी ठीकसे गर्म हुई हैं या नहीं । दोष : सतर्कताका अभाव
५. किसी अतिथिको योग्य प्रकारसे जलपान नहीं करवाया । दोष : आतिथ्यभावका अभाव
६. घर आए अतिथिको कुछ आवश्यक ग्रन्थ देना भूल गई । दोष : भुलक्कडपन/स्मरणहीनता
७. दिनमें कुछ शारीरिक कष्ट होनेपर आध्यात्मिक उपाय करना ध्यान नहीं रखा, जबकि मुझे ज्ञात हो रहा था कि यह अनिष्ट शक्तियोंके कारण हो सकता है । दोष : सतर्क होकर योग्य प्रकारसे उपाय न करना
८. अपनी कुछ सेवा इस विचारके साथ अपूर्ण छोड दी कि यह कोई और कर लेंगे । दोष : आलस्य , सेवाको पूर्ण करनेकी प्रवृत्तिका न होना
९. सबसे मुख्य चूक तो यह है कि अपनी कई चूकें ध्यानमें नहीं आती हैंं और दूसरोंसे पूछना पडता है । दोष : बहिर्मुखता
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