समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग – ८)


समष्टि साधना हेतु स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलनकी प्रक्रिया है परम आवश्यक
चूंकि समष्टि साधनाका महत्त्व कलियुगके अन्ततक रहनेवाला है; इसलिए इस साधनाको करने हेतु अपने दोषोंको न्यून करना अति आवश्यक है, विशेषकर ऐसे दोषोंको जिससे समष्टिको हानि पहुंचती हो, उसे प्राथमिकतासे दूर करना चाहिए और इसे दूर करने हेतु स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया करना अति आवश्यक है !
समष्टि साधनामें सबसे बडी अडचन हमारे दोष ही होते हैं, जिसकारण हमारी साधनाका क्षरण तो होता ही है, सह-साधकोंको भी कष्ट होता है; अतः अपने दोषोंको दूर करना अति आवश्यक है !
(समष्टि साधना करते समय साधकके दोषोंके कारण किसप्रकार कष्ट होता है ?, यह आपको विस्तारसे दोष निर्मूलन सम्बन्धित लेखमें बता ही चुके हैं ! निकट भविष्यमें अहं निर्मूलनकी प्रक्रिया भी आपको बताएंगे ।)



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