जैसे मेढककी टर्टरानेकी गूंज बरसातमें सुनाई देती है, वैसे ही चुनाव आनेपर नेतागण चारों ओर अपना मायाजाल फेंकने लगते हैं ! एक राजनेताका, जिसे मैं जानती नहीं हूं, मेरे पास पत्र आया था, “मैं फलां-फलां राज्यमें अनेक स्थानोंंपर आपके प्रवचन करवाना चाहता हूं !” मैंने कहा, “यह तो बडी अच्छी बात है; परन्तु आपका इसमें स्वार्थ क्या है ?” उन्होंने कहा, “मैं आपकेे समान धर्मकी निस्वार्थ सेवा करना चाहता हूं ।”
मैंने उत्तर दिया, “आपके विचार अत्यधिक उत्तम हैंं, परन्तु मैं चुनावके मध्य आपके पक्षके सन्दर्भमें कुछ नहीं बोलूंगी और न ही उसके प्रचारमें कोई योगदान दूंगी; क्योंकि मेरा मानना है कि इस देशमें आजके समयमें कोई भी पक्ष पूर्णत: धर्मनिष्ठ नहीं है और उनके आदर्श एवं राजकाजकी पद्धतियां पूर्णत: हिन्दू हितकी नहीं होती हैं । ऐसे सभी राजनीतिक पक्ष, राष्ट्र और धर्मके हितका विचार छोड अपनी रोटियां सेंकनेमें लगे रहते हैं और उनके सभी नेताओंके विषयमें तो पूरा भारत जानता है ! यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार्य है तो आप मेरे आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित करवा सकते हैं ! मैं न व्यक्तिनिष्ठ हूं, न पक्षनिष्ठ; मैं राष्ट्रनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, तत्त्वनिष्ठ और ईश्वरनिष्ठ हूं । मेरी कोई राजनीतिक एवं अन्य कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं है और रही बात धर्म प्रसार की तो वह तो ईश्वर करवाएंगे ही ! किसी भी व्यक्ति, पक्षकी कृति यदि अयोग्य दिखी तो मैं उसपर अपनी प्रतिक्रिया मुखर होकर राष्ट्रहित और समाजहितमें अवश्य दूंगी !” मेरे दृष्टिकोणको जाननेके पश्चात नेताजीका ‘धर्मकी निष्काम सेवा’का भूत उतर गया ! नेताजीका नाम न पूछें, मुझे किसीका उपहास करना अच्छा नहीं लगता ! – तनुजा ठाकुर (८.४.२०१४)
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