क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १२)


ध्यान रखें, सूक्ष्म मनको हम और किसी भी माध्यमसे नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं, इस हेतु कोई सूक्ष्म शस्त्र ही चाहिए और वह सूक्ष्म शस्त्रका एक माध्यम है, नामजपरुपी साधना । अनेक विचारोंमें रममाण रहनेवाले हमारे मनद्वारा यदि नामजपका अखण्ड अभ्यास किया जाए तो हमारे मनका प्रवास अनेक विचारोंसे एक विचारकी ओर सहज ही हो जाता है और यह साध्य होनेपर मनुष्य-जीवन सार्थक हो जाता है; इसलिए नामजप करें !
भगवान श्रीकृष्णने भी कहा है –
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते ॥ – श्रीमद भगवदगीता ६:३५

अर्थ : हे महाबाहो ! निःसंदेह मन चंचल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; किन्तु हे कुंतीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्यसे वशमें किया जा सकता है ।
नामजप एक सहज अभ्यास है और नाममें वैराग्य रुपी ईश्वरीय गुण समाहित होता है; इसलिए नामजप करते-करते वैराग्य भी स्वतः ही निर्माण होने लगता है; मात्र इसे उत्कण्ठा, भाव एवं सातत्यसे करना चाहिए ।



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