चारों पुरुषार्थोंंकी प्राप्ति कैसे कर सकते हैं ?, पूर्वकालमें इस हेतु सभी प्रयत्नशील रहते थे । कलियुगी जीवके लिए अर्थ और कामकी प्राप्ति प्रधान होती है, ऐसेमें ईश्वरप्राप्ति हेतु प्रयत्न करनेके लिए उसके पास समय नहीं होता; इसलिए हमारे द्रष्टा ऋषियों एवं सन्तोंने कलियुगमें नामजपकी साधना बताई है और इतना ही नहीं, यह भी कहा है कि वह तप, योग, समाधिसे भी श्रेष्ठ साधना है । इसका प्रमाण श्रीमद्भागवतमें दिया गया है, जिसमें कहा गया है –
यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना ।
तत्फलं लभते सम्यक्कलौ केशव कीर्तनात् ।।
अर्थ : जो फल तपस्या, योग एवं समाधिसे भी नहीं मिलता, कलियुगमें वही फल श्री हरिकीर्तनसे सहज ही मिल जाता है । ईश्वरप्राप्तिका इतना सरल साधन होते हुए भी यदि कोई नामस्मरण न करे तो उससे बडा मूढ और कौन हो सकता है ? अर्थोपार्जन हेतु प्रयत्न करते समय नामजप करनेका प्रयास करना चाहिए, वैसे ही अपनी इच्छाओंकी तृप्तिके समय भी नामजप करनेसे मनमें नूतन इच्छाओंका जन्म नहीं होता या अल्प प्रमाणमें होता है तथा जो इच्छाएं तीव्र होती हैं, उनकी पूर्ति नामजप करनेसे स्वत: ही हो जाती है । इसप्रकार अर्थोपार्जन करते समय एवं अपनी इच्छाओंकी पूर्तिके समय अखण्ड नामस्मरण करनेसे जीव धर्मकी ओर प्रवृत्त होता है, जो उसकेे मोक्षप्राप्तिके मार्गको प्रशस्त करता है; अतः नामजप करें ।
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