समाजको वासनाकी ओर प्रवृत्त करनेवाली आजकी पत्रकारिताका अब निषेध करनेका समय आ चुका है !
जब भी कभी सामायिक विषयोंसे सम्बन्धित समाचार पढने हेतु ऑनलाइन समाचारपत्रोंका अवलोकन करती हूं तो कुछ वृत्तपत्रोंमें वृत्त-शीर्षकमें ही अश्लील वृत्त एवं उससे संलग्न छायाचित्रोंको देखकर मन खिन्न हो जाता है, विशेषकर कुछ समाचारपत्र तो अपनी मर्यादाकी सभी सीमाएं लांघ चुके होते हैं । पहले यह अंग्रेजी वृत्तपत्रोंमें देखनेको मिलता था, अब हिन्दी समाचारपत्र भी इस निकृष्ट प्रतिस्पर्धामें पीछे नहीं हैं ! ऐसे समाचारपत्रके जालस्थलको देखकर लगता है कि ये ऑनलाइन वृत्तपत्र नहीं, कोई अश्लील जालस्थलका प्रचार कर रहे हों !
इससे यह तो सिद्ध होता है कि ऐसी पत्रकारिता करनेवाले विकृत मनोवृत्तिके पत्रकारोंको अपनी लेखनीपर या अपने वृत्त प्रकाशित करनेके कौशल्यपर विश्वास ही नहीं रहा है; अतः वे स्त्रियोंंके अर्धनग्न या नग्नदेहका सहारा लेकर अपने व्यापारको बढाना चाहते हैं । यह तो एकप्रकारसे स्त्रियोंका अप्रत्यक्ष रूपसे देह व्यापार करने समान ही है ! पत्रकारिताके इस घृणित स्वरुपको देखकर लगता है कि धर्मविरहित ‘तथाकथित बुद्धिजीवी’ वर्गका बौद्धिक पतन किस सीमा तक हो चुका है ! जी हां, जो वर्ग विवेकशून्य, नीतिशून्य, संस्कारविहीन, धनलोलुप एवं वासनाके पुजारी होकर समाचारके नामपर निर्लज्ज अर्धनग्न स्त्रीके छायाचित्रोंकी सहायतासे अपने व्यापारको बढाना चाहता हों, वे बुद्धिजीवी कहलानेके अधिकारी कैसे हो सकते हैं ?, वे तो ‘तथाकथित बुद्धिजीवी’ कहलानेके ही योग्य हैं, वस्तुतः ऐसे सभी व्यक्ति बुद्धजीवीके नामपर कलंक हैं !
कहां इतिहासमें स्वर्णिम अक्षरोंमें अपना नाम अंकित करनेवाले स्वतन्त्रता पूर्व कालके पत्रकार बन्धु थे; जिन्होंने जो अपनी लेखनीके बलपर समाजमें क्रान्ति लाकर सम्मानके पात्र बनें एवं जिन्होंने ऐसा कर मां सरस्वतीकी कृपा अर्जित की तथा समाजके समक्ष अपनी लेखनीके महत्त्वको बताया और कहां समाजको वासनाकी ओर प्रवृत्त करनेवाले आजके विकृत मानसिकतावाले धनलोलुप पत्रकारगण, जिनकी ये अधर्मी कृतियां उनपर निश्चित ही मां सरस्वतीकी अवकृपा संचारित कर रही हैं !
लेखन एक ईश्वरप्रदत्त गुण है, जो भी इसका दुरुपयोग कर समाजको दिशाहीन करता है, वह इहलोकके इतिहासमें निंदाका पात्र तो बनता ही है एवं परलोकमें भी नरकगामी होता है, अपने पापोंका दण्ड उसे अगले जन्मोंमें मूढ एवं विक्षिप्त बनकर भोगना पडता है ! ध्यान रहे, यह सृष्टि कर्मफल सिद्धान्तपर चलती है; अतः बुद्धि और विवेकका उपयोग कर अपना इहलोक और परलोक सुधारें ! मुझे नहीं लगता कि लेखनीका इसप्रकारका तिरस्कार एवं दुरुपयोग आजतकके इतिहासमें भारतमें कभी भी बुद्धिजीवी वर्गने किया होगा ! समय आ गया है कि इस देशमें पत्रकारिताके भी मापदण्ड निर्धारित हों, अन्यथा नीतिशूूून्य पत्रकारिता समाजको दिशाहीन कर नरपशुमें परिवर्तित कर देगी ।
कभी-कभी किसी पुरुष साधकके साथ बैठकर यदि मुझे कुछ ऑनलाइन बातें सिखानी होंं तो अकस्मात ऑनलाइन प्रकट हुए ऐसे अश्लील छायाचित्र देखकर या वृत्तके शीर्षक पढकर मन संकोचमें पड जाता है, और अब तो मैं ऐसा करना टालने भी लगी हूं । सोचती हूं, क्या एक सुसंस्कृत कही जानेवाली सभ्य भारतीय समाजकी लज्जा, आजके संस्कारविहीन नेत्रोंसे लुप्त हो गयी है ?
सचमें धर्मविहीन समाजको पशुताकी ओर अग्रसर होनेमें समय नहीं लगता, इसीसे धर्मका महत्त्व ज्ञात होता है !
मुझे ज्ञात है कि मेरे लेखोंको बडी संख्यामें भारत भरके पत्रकार बन्धु पढते हैं और उनके इस विशेष स्नेह हेतु मैं मन:पूर्वक कृतज्ञता व्यक्त करती हूं । मेरे आजके इस लेखसे कुछ पत्रकार बन्धु क्रोधित होंगे; किंतु आज मैं अत्यन्त क्षुब्ध होकर इसे लिखने हेतु बाध्य हुई हूं; यथार्थमें इस विभत्स सत्य एवं उसके परिणामसे सभीको परिचित करवाना अब अति आवश्यक हो गया था ! अपनी इस धृष्टतासे मैं किसीको वैयक्तिक रूपसे अपमानित नहीं करना चाहती हूं, अपितु आप अपने विशेष ईश्वरप्रदत्त कौशल्यसे समाजनिर्माणका कार्य कर सम्मानके अधिकारी एवं मां सरस्वतीके कृपापात्र बनें, इस विशुद्ध हेतुसे अपने विचार प्रकट किए हैं । ईश्वरीय कृपासे मुझे भी एक पत्रिकाका सम्पादन करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है; अतः आप मेरे बन्धु समान हैंं और एक शुभचिन्तक होनेके नाते इस लेखको लिखनेकी धृष्टता की है ।
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