नवम्बर २२, २०१८
धरोहरके संरक्षणके लिए महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभा रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षणमें नूतन संस्कृति देखनेको मिल रही है । अब स्मारकोंमें संरक्षणपर कम और पर्यटकोंको सुविधाएं उपलब्ध करानेपर अधिक ध्यान है । संरक्षणका कार्य बहुत अल्प हो गया है । अब स्मारकोंमें फर्श बनानेसे लेकर शौचालयोंको संवारनेपर अधिक ध्यान है । स्मारकोंके संरक्षणके लिए लडाई लड रहे अधिवक्ता लखविंदर सिंह कहते हैं कि स्मारकोंमें पर्यटकोंको सुविधाएं उपलब्ध कराना अनुचित नहीं है, परन्तु संरक्षण कार्यपर भी ध्यान दिया जाना चाहिए । वहीं इस बारेमें एएसआइके प्रवक्ता डॉ. डी. एन.डिमरी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि संरक्षण कार्य रोक दिया गया है । जहां आवश्यकता है संरक्षणका काम भी कराया जा रहा है ।
धरोहरके संरक्षणको लेकर उदासीनताकी बात करें तो दिल्लीमें १२०० स्मारकोंमें से १७४ ही एएसआइके पास संरक्षित हैं, जबकि २५० को दिल्ली सरकारने संरक्षित करनेकी तैयारी आरम्भ की है । जबकि ७७६ ऐसे स्मारक हैं जिसकी सुध कोई नहीं ले रहा ! इनमेंसे कई हवेलियां भी पुरातात्विक धरोहरकी सूचीमें हैं, परन्तु इन्हें तोडनेका प्रकरण जारी है ।
एएसआइका लाल किलामें पूरा ध्यान संग्रहालय बनानेपर है । इसके अतिरिक्त रिक्त मैदानोंमें पार्क बनाए गए हैं । शौचालय बनाए जा रहे हैं, परन्तु मुख्य निर्माणपर ध्यान नहीं है । दिल्ली गेटसे घुसनेपर दाहिनी ओर १० मीटर चलनेपर भवनका स्थिति बुरी है ।
मथुरा रोड स्थित राष्ट्रीय महत्वके स्मारक शेरशाह सूरी गेटपर पांच वर्षोंसे एएसआइका ताला लगा हुआ है । इसके ठीक सामने पुराना किलामें व्यवस्थाएं करनेपर कोट्यावधि रूपयोंकी योजनापर कार्य किया गया है, परन्तु इसका संरक्षण नहीं करा सका है ।
महरौली स्थित लालकोटकी भित्त कहनेके लिए एएसआइके पास संरक्षित है, परन्तु भित्त अभी तक भूमिमें ही दबी है । संजय वनके दूसरे भागमें स्थित इसका कुछ भाग दिखता भी है ।
विक्रामजीत सिंह रूपरायने (हेरिटेज एक्टिविस्ट) कहा कि एएसआइकी अनदेखीसे स्मारकोंपर अवैध अधिकार हुए हैं । सरकारको चाहिए कि ऐसे प्रकरणको गंभीरतासे लिया जाए ।
“प्राकृतिक संसाधन, वन, पर्वत, नदियां, मूल धर्म और प्राचीन धरोहर; क्या कुछ ऐसा है जिसे हम तथाकथित आधुनिक व विकासशील नागरिक व शासकगण संरक्षित कर पाए हैंं ? नहीं, क्योंकि हमारा धर्म, संस्कार व मूल्य इतने गिर चूके हैं कि हमारा पूर्ण ध्यान येन-केन प्रकारसे केवल माया अर्जित करनेमें हैं ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जागरण
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