ख्रिस्ताब्द २००० में एक मन्दिरमें वृद्ध स्त्रियोंकी भजन मण्डलीमें प्रवचन हेतु गई थी । वहां भजनके पश्चात स्त्रियां रामनामका जप १०८ बार कर रहींं थींं; किन्तु उस जपमें माधुर्य, भक्ति एवं भाव कुछ भी नहीं था, भजन समाप्त हो चुका था, इसलिए कुछ स्त्रियोंका ध्यान घडीपर था । मेरे प्रवचनके पश्चात एक वृद्ध स्त्री, जो उस भजन मण्डलीकी अध्यक्षा थीं, उन्होंने कहा, “तम्हारी आयु तो मेरी पोतीके जैसी है; किन्तु तुम्हारे उद्बोधन सुनकर मुझे लगता है कि तुम्हारी आध्यात्मिक प्रगति मुझसे अधिक हुई है, हम चालीस वर्षोंसे कीर्तन कर रहे हैं; किन्तु मनमें शान्ति नहीं है; जब तक यहां रहती हूं तभी तक मन शान्त रहता है; घर जाते ही माया मेरे चित्तको जकड लेती है; इससे मन दुखी हो जाता है, मैं क्या करूं बिटिया ?” मैंने कहा, “आपने जो चालीस वर्ष भक्ति की है, उसका ही यह परिणाम है कि आपमें इतनी अन्तर्मुखता तो है कि आपको यह भान होता है कि मेरा चित्त अभी तक भक्तिमें नहीं रंगा है, अन्यथा अनेक भजन गानेवालोंको तो इसका भी भान नहीं होता है !” वे यह सुनकर बोलीं, “किन्तु बिटिया मनको रामके नाममें कैसे रमायें कि मायाकी आंच मुझे स्पर्श न करे ?” उस वृद्ध स्त्रीमें विनम्रता थी और अपने जीवनके अन्तिम पडावमें पहुंचकर भी अध्यात्ममें कुछ विशेष साध्य न कर पानेका दुःख भी था । उनकी ग्लानि, विनम्रता और जिज्ञासा देखकर मैंने भजन मण्डलीकी भी चूक बतानेका निश्चय कर सबसे पूछा, “आप सब मेरी माताजीके आयुकी हैं; इसलिए आपको दुःख पहुंचानेका मेरा कोई उद्देश्य नहीं है; किन्तु आज मुझे आप सबकी एक चूक ध्यानमें आई है, यदि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं उसे बताना चाहूंगी !” अपनी अध्यक्षाको ही विनम्र होकर प्रश्न करते देख उन लोगोंने मुझे उनकी चूक बतानेकी स्वीकृति दी । मैंने कहा, “अभी आप लोग रामनामका १०८ बार राम-राम १, राम-राम २, इस प्रकार जप कर रही थीं; किन्तु उसमें रस नहीं था, अपितु लग रहा था जैसे आप रामजीको छडी मार रहींं हैं ! भगवानका नाम लेते समय इतनी आर्तता होनी चाहिए कि वे कहीं भी होंं, आपके समक्ष प्रकट हो जाएं । भगवानका नाम कैसे लेना चाहिए ?, इस विषयमें एक श्लोक है –
आदरेण यथा स्तौति धनवन्तं धनेच्छया ।
तथा चेद्विश्चकर्तारं को न मुच्येत बन्धनात् ॥
अर्थ : धनलालसासे जिस प्रकार धनवानकी स्तुति (व्यक्ति) करता है, वैसे यदि विश्वकर्ताकी (भगवानकी) करे, तो कौन बंधन मुक्त न हो ?
इसलिए नाममें भक्ति निर्माण करें, वह प्रेम और भावसे हो, उस नामसे उत्पन्न रससे आपके मनमें उस देवताके प्रति अनुराग उत्पन्न हो जाए, ऐसे लेना चाहिए । नाममें अनुराग उत्पन्न करने हेतु उस देवताके विषयमें चिन्तन करना, उनके रूप और गुणका ध्यान करना, वे प्रथम तो आपके आस-पास हैंं और उसके पश्चात आपके रोम-रोममें बसे हैं, ऐसा भाव रखनेसे ही देवता प्रसन्न होते हैं । लौकिक जगतमें एक सामान्य व्यक्तिको प्रसन्न करने हेतु कितने पापड बेलने पडते हैं ?, यह तो आपको ज्ञात ही है तो ईश्वरको प्रसन्न करने हेतु किस पराकाष्ठाके साथ प्रयत्न करने चाहिए ?, आप स्वयं सोचें ।” ऐसा लगा कि मेरे इस उत्तरको सुनकर सभी सदस्योंकी शंकाका समाधान हो गया और वे प्रेमपूर्वक नामजप करेंगी, ऐसा उन्होंने कहा और मुझे वहां उपस्थित सभी वयोवृद्धोंका आशीर्वाद रुपी प्रसाद मिला ।
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