दिसम्बर ३, २०१८
न्यायाधीश कुरियन जोसेफने सेवानिवृत्त होनेके कुछ दिवस पश्चात सोमवार, ३ दिसम्बरको एक दावेमें कहा कि पूर्ववर्ती सीजेआई दीपक मिश्रा किसी ‘बाहरी नियन्त्रण’के प्रभावमें कार्य कर रहे थे, जिससे न्यायिक प्रशासन प्रभावित हुआ । बता दें कि न्यायाधीश जोसेफने उच्चतम न्यायालयके तीन अन्य न्यायाधीश जे चेलमेश्वर (अब सेवानिवृत्त), रंजन गोगोई (वर्तमान में सीजेआई) और मदन लोकुरके साथ १२ जनवरीको एक सामूहिक समाचार वार्ता कर मिश्राके विरुद्घ यह प्रकरण उजागर किया था । चारों न्यायाधीशोंने संवेदनशील प्रकरणके आवंटनको लेकर अपनी चिंता प्रकट की थी ।
२९ नवंबरको सेवानिवृत्त हो चुके जस्टिस जोसेफने कहा, ”तत्कालीन सीजेआई किसी ‘बाहरी नियन्त्रण’के प्रभावमें कार्य कर रहे थे । वह किसी बाहरी शक्तिद्वारा दूरसे ही नियन्त्रित थे ! किसी बाहरी शक्ति का कुछ प्रभाव था, जो न्यायिक प्रशासनको प्रभावित कर रहा था !” यह पूछे जाने पर कि वह यह दावा किस आधारपर कर रहे हैं, जस्टिस जोसेफने कहा कि उन न्यायाधीशोंकी ऐसी धारणा थी, जिन्होंने उच्चतम न्यायालयके समक्ष उत्पन्न मुद्दोंको लेकर सम्वाददाता सम्मेलन किया था । ऐसी ही धारणा न्यायालयके कुछ अन्य न्यायाधीशोंके मध्य भी थी ।
उन्होंने इस बारेमें विस्तारसे बतानेसे मना कर दिया कि वह ‘बाहरी नियन्त्रण’ क्या था और वे कौन से प्रकरण थे, जिसमें पक्षपात हुआ ? और न्यायिक प्रशासन प्रभावित हुआ । यह पूछे जाने पर कि क्या कथित प्रभाव किसी राजनीतिक दल या सरकारद्वारा किसी विशेष प्रकरणमें डाला गया ?, न्यायाधीश जोसेफने कहा कि न्यायाधीशोंका विचार था कि सम्बन्धित न्यायाधीशद्वारा कुछ पक्षपात किया गया था । उन्होंने कहा कि किसी विशेष प्रकरणका उल्लेख करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है । उन्होंने कहा, ”मुझे क्षमा करिए, मैं इसे आगे नहीं बढाना चाहता ।”
सेवानिवृत्त न्यायाधीशने यद्यपि कहा कि उस दबावका प्रभाव हुआ और न्यायमूर्ति मिश्राके सीजेआईके रूपमें शेष कार्यकालके समय चीजें अच्छेके लिए परिवर्तित होनी आरम्भ हो गई और वह न्यायमूर्ति गोगोईके नेतृत्वमें जारी हैं । न्यायमूर्ति मिश्रा दो अक्टूबरको सेवानिवृत्त हो गए । उन्होंने कहा कि न्यायालयके कार्यकी गुणवत्ता और संस्थानकी स्वतन्त्रता सम्बन्धी धारणामें एक सुधार आया है ।
“ पूर्व न्यायाधीश जिस बाहरी नियन्त्रणकी बात कर रहे हैं, क्या वह भारतके हितमें होगी ? और ऐसेमें जब निर्णयकी सम्पूर्ण शक्ति कुछ व्यक्तियोंके हाथमें दे दी जाए तो ऐसी परिस्थितिमें क्या धर्मोचित न्यायकी आशा की जा सकती है ? अतः अब धर्मराज्यकी स्थापना अनिवार्य है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जी न्यूज
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