सर्वसामान्य हिन्दूको आज योग्य प्रकारसे धर्मशिक्षण नहीं मिलनेके कारण उसकी वृत्ति बहिर्मुख हो चुकी है और ऐसे व्यक्ति मात्र सांसारिक भोगमें अपने सुख और शान्तिके साधनको ढूंढते है और इसी क्रममें उसका सम्पूर्ण जीवन निकल जाता है; किन्तु उसे प्राप्त हुए भौतक सुखसे न संतुष्टि मिलती है और न ही मानसिक शान्ति । आजके सामान्य हिन्दूको सुख और आनन्दके मध्यका भेद तो ज्ञात ही नहीं है । खरा सुख आत्मानन्दमें है और वह मात्र योग्य प्रकारसे साधना करनेसे मिल सकता है । जिसे आनन्दकी एक बार अनुभूति हो जाए, उसे, उससे तृप्तिकी अनुभूति स्वतः ही होने लगती है; क्योंकि आनन्दसे ही संतुष्टि प्राप्त हो सकती है, सुखसे नहीं ।
ईश्वरका नाम आनन्द प्राप्त करनेका एक शाश्वत स्रोत है एवं एक बार इसका उद्गम अपने भीतर हो जाए अर्थात वह अन्तर्मनमें आरम्भ हो जाए तो उस जीवको संसारकी किसी भी वस्तुकी इच्छा नहीं होती है एवं सत्य स्थिति तो यह है कि उसके लिए ब्रह्माण्डकी कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं रहती । सुख और आनन्दमें क्या भेद है और आनन्दके पानेपर क्या होता है, इस विषयमें एक शास्त्र वचन कहता है –
सुखं आत्यांतिक यत् तत् बुध्दिग्राह्यं अतीद्रियं ।
यं लब्वा आत् चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।।
अर्थ : जिस सुखको शरीरके अंगोंके माध्यमसे नहीं प्राप्त किया जा सकता है, उस सुखकी अनुभूति लेनेके पश्चात और उसकी बुद्धिसे कुछ सीमा तक प्रतीति लेनेपर अन्य किसी भी प्रकारके सुखको पानेकी इच्छा शेष नहीं रहती, उसे ही आत्मानन्द कहते हैं और आत्मानन्दकी इस अनुभूति हेतु अखण्ड नामस्मरण करें ।
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