हिन्दू धर्मद्वारा प्रतिपादित जन्म और मृत्युके मध्य होनेवाली धार्मिक कृतियां जैसे विवाह, वास्तु शान्ति (एक ऐसी धार्मिक कृति जिसमें वास्तुकी शुद्धि हेतु आध्यात्मिक उपाय सम्पन्न किए जाते हैं) एवं श्राद्ध-कर्म (ऐसी धार्मिक प्रक्रिया जो किसी व्यक्तिके मृत्युकी तिथिसे तेरहवें दिनतक की जाती है अथवा हिन्दू पंचांगद्वारा निर्दिष्ट पुण्यतिथिपर मृत पूर्वजोंके सूक्ष्म शरीरकी शान्ति हेतु किए जाते हैं) आदि भी कर्मकाण्डकी श्रेणीमें आते हैं एवं ईश्वरप्राप्ति हेतु पूरक होते हैं । कुछ उपासनाकी पद्धतियां हैं, जैसे पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन जो ईश्वरसे सीधा सम्पर्क और उनकी कृपा हेतु होता है । क्या आधुनिक विज्ञानमें किए जानेवाले कोई भी प्रयोग, ईश्वरप्राप्तिकी अनुभूति प्रदान करनेकी क्षमता रखता है ? – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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