क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – २५)


मृत्यु अनिश्चित है, वह कब आएगी ?, यह ज्ञात नहीं होता और मृत्यु वृद्धावस्था आनेपर ही आएगी, ऐसा भी नहीं है । आए दिन हम अनेक लोगोंकी अकाल मृत्युके समाचार सुनते ही रहते हैं; अतः प्रत्येक व्यक्तिने, चाहे मृत्यु कभी भी आए, उसकी पूर्वसिद्धता आध्यात्मिक रूपसे अवश्य करनी चाहिए और इस हेतु प्रत्येक श्वासोच्छ्वासके साथ नामजप करना चाहिए । जैसे सांस निरन्तर लेने हेतु हमें अभ्यास नहीं करना पडता है, वैसे ही नामजपको भी यदि सांसके साथ जोड दिया जाए तो वह निरन्तर होने लगता है एवं मृत्यु या देहावसानके पश्चात जब सांस बन्द हो जाए तो चित्तमें नामजपके संस्कार अंकित होनेपर वह अखण्ड तबतक होता रहता है जब तक चित्तकी एकरूपता नामके साथ साध्य न हो जाए; अतः नश्वर श्वासको शाश्वत नामका जोड दें एवं मनुष्य जीवन सार्थक करें । संत कबीर दासजी कहते हैं कि –

काह भरोसा देह का बिनसी जाय छिन मांहि ।

सांस सांस सुमिरन करो और जतन कछु नाहिं ॥

अर्थात इस नश्वर देहका कोई भरोसा नहीं वह कब छूट जाए, प्रत्येक सांसके साथ सुमिरन करें; क्योंकि इस हेतु कुछ विशेष प्रयत्न नहीं करने पडते हैं ।



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