मन्त्रजप और नामजपमें मुख्य भेद यह है कि नामजप यदि अयोग्य रीतिसे या अनुचित उच्चारणसे किया जाए तो भी उसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पडता है अपितु यदि नामजप भावपूर्वक किया जाए और उसमें कोई चूक हो तो भी (वाक्य अधूरा है)
जान आदिकबि नाम प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी । जपि जेईं पिय संग भवानी ॥
अर्थ : आदिकवि श्री वाल्मीकिजी रामनामके प्रतापको जानते हैं, जो उल्टा नाम (‘मरा’, ‘मरा’) जपकर पवित्र हो गए । श्री शिवजीके इस वचनको सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नामके समान है, पार्वतीजी सदा अपने पतिके (श्री शिवजीके) साथ राम-नामका जप करती रहती हैं । नामजप कैसे भी करें, कहीं भी करें, किसी भी परिस्थितिमें करें, उससे कभी हानि हो ही नहीं सकती है; अतः अखण्ड नामजप करें !
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