दिसम्बर १२, २०१८
बिहारके कई क्षेत्रोंमें जातिवादकी जडें कितनी गहरी हैं, इसका अनुमान एक विद्यालयकी हिसाब बहीसे (रजिस्टर) लगाया जा सकता है । विद्यालयको शिक्षाका मन्दिर कहा जाता है, किन्तु पूर्वी चम्पारणके तेनुआ उच्च विद्यालयमें भिन्न-भिन्न जातिके बच्चोंके भिन्न-भिन्न हिसाब बही बनाई गई हैं ।
इस विद्यालयकी स्थापना १९५२ में हई थी, यहां ६७८ छात्र-छात्राएं पढते हैं, परन्तु विद्यालयके प्रभारी कमलेश कुमारने सभी कोटिके बच्चोंका भिन्न-भिन्न सूचि बना कर वर्गको विभाजित दिया है । कक्षा-९ में ७ विभाग बनाए गए हैं – ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी । शासनके रिकॉर्डमें पिछडी जाति, अत्यन्त पिछडी, अनुसूचित जाति और सामान्य जातिके अनुसार इस सूचिको बनाया गया है ।
ऐसा ही ‘कक्षा-१०’का भी है, जिससे स्पष्ट होता है कि विद्यालयमें शिक्षकोंने जातिगत भेदभाव किया है । सभी विभागोंमें भिन्न-भिन्न जातिके बच्चोंको बैठने और पढनेकी व्यवस्था की गई है, जिससे समरस समाज बनानेकी प्राथमिकता धूमिल होती दिख रही है । बच्चोंमें शिक्षाके साथ जातीय विष घोलनेका काम किया जा रहा है ।
इस समूचे प्रकरण और वर्ग विभाजनके ढंगकी जानकारी विद्यालयके प्राचार्यसे लेनेका प्रयास किया गया तो उन्होंने कुछ भी कहनेसे मना कर दिया, किन्तु विद्यालयके लिपिकने (क्लर्कने) जो तर्क दिया वो अचम्भित करने वाला है। उसने कहा कि शासन छात्र-छात्राओंकी विभिन्न योजनाएं जैसे ‘स्टाईपेंड ड्रेस साइकिल’ योजनाओंके लिए जातिगत सूची मांगती है, शासनको यह विवरण स्थायी रूपसे मिले, इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई है । उसका ये भी कहना है कि यह व्यवस्था गत कई वर्षोंसे चली आ रही है ।
“लोकतन्त्रमें ही हमें विभाजित किया गया, जिसका अनुपालन शासनद्वारा मतोंकी राजनीति हेतु आज भी किया जाता है, दुखद है कि छात्रोंपर इसका क्या प्रभाव पडता है ! संस्कार बचपनसे ही निर्मित होते हैं और पहले ही हिन्दू अनेक जातियों और उपजातियोंमें विभाजित होकर खण्ड-खण्ड हो चूके हिन्दू समाजमें ऐसे कृत्य तो अपराध बन जाते हैं, क्योंकि कल लही छात्र भविष्यका निर्माण करने वाले हैं । आगामी हिन्दू राष्ट्रमें ऐसी जाति-उपजातिय विभाजनका कोई स्थान नहीं होगा !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : आजतक
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