दिसम्बर १३, २०१८
जम्मू कश्मीर पुनर्वास विधानको चुनौती देने वाली याचिकापर गुरुवार, १४ दिसम्बरको उच्चतम न्यायालयने सुनवाई की और न्यायाधीश रंजन गोगोईने पूछा है कि विभाजनके समय पाकिस्तान जा चुके लोगोंके वंशजोंको कैसे भारतमें रहनेकी आज्ञा दी जा सकती है ? न्यायालयने राज्य शासनसे प्रश्न किया कि जम्मू कश्मीरमें पुर्नवासके लिए अभी तक कितने लोगोंने आवेदन किया है ?
न्यायालयने कहा कि १९४७-१९५४ के मध्य पाकिस्तान जा चुके लोगोंको हिन्दुस्तानमें पुर्नवासकी आज्ञा देता है । इसके विरुद्ध कश्मीर पैंथर पार्टीकी ओरसे प्रविष्ट याचिकामें कहा गया है कि ये विधान असंवैधानिक और मनमाना है, इसके चलते राज्यकी सुरक्षाको संकट हो गया है । केन्द्र शासनने भी याचिकाकर्ताका समर्थन किया है ।
न्यायालयमें शासनकी ओरसे प्रस्तुत सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहताने कहा कि शासन पहले ही न्यायालयमें हलफनामा देकर ये स्पष्ट कर चुका है कि वो विभाजनके समय सीमा पार गए लोगोंकी वापसीके पक्षमें नहीं है । वहीं, जम्मू कश्मीर शासनने सुनवाई टालनेकी मांग की । राज्य शासनका कहना है कि जब तक उच्चतम न्यायालय ‘अनुच्छेद ३५-ए’को चुनौती देने वाली याचिकापर निर्णय नहीं दे देता, तब तक इसपर विचार न हो ।
राज्य और केन्द्र शासनसे उत्तर मांगते हुए न्यायालयने इस प्रकरणकी सुनवाईको जनवरी तकके लिए टाल दिया है । न्यायालयने कहा कि अब इस प्रकरणकी अगली सुनवाई जनवरीके दूसरे सप्ताहमें होगी । बता दें कि इससे पूर्व उच्चतम न्यायालय २०१६ में संकेत दे चुका है कि ये प्रकरण विचारके लिए संविधान पीठको सौंपा जा सकता है ।
“जब धर्मान्ध बांग्लादेशी व रोहिंग्या जब इस देशमें बिना रोक-टोक रह सकते हैं तो सीमापारसे वहां आतंकसे त्रस्त हिन्दू क्यों नहीं ? यदि यह नियम लागू होता है तो रोहिंग्याओंको जो आतंका पर्याय बन चूके हैं, उन्हें क्यों भारतमें फैलने दिया गया ? जिन हिन्दुओंको वहां त्रस्त किया जाता है, उनका यहां पुनर्वास आवश्यक है । अन्ततः विभाजन भी धर्म आधारित ही हुआ था और यह स्वयं मिजोरमके न्यायाधीश सेन कह चूके हैं, तब शासन और उच्चतम न्यायालय इसे स्वीकार क्यों नहीं करते हैं ?”
स्रोत : जी न्यूज
Leave a Reply