हिन्दुओंकी क्षत्रियहीनता धर्मके पतनका कारण !!


बौद्ध और महावीरके कालसे ही हिन्दुओंको तथाकथित अहिंसाका ऐसा पाठ पढाया गया है कि आज तक हिन्दू अपने ऊपर होनेवाले आक्रमणोंका प्रतिकार क्षात्रवृत्तिसे नहीं कर पाता है ! कश्मीरसे लेकर केरलतक हिन्दुओंपर या हिन्दुओंके आस्थाकेन्द्रोंपर सतत आक्रमणों एवं आघातोंसे यही सिद्ध होता है ।
   जो अंशमात्रकी क्षात्रवृत्ति बची थी, वह १८७८ के शस्त्र अधिनियम (आर्मस एक्ट) और मैकालेकी पाश्चात्य शिक्षण प्रणालीने नष्ट कर दी, अब तो हिन्दू इतना मृतवत हो चुका है कि उसे क्षात्रवृत्ति शब्द ही ज्ञात नहीं है; इसलिए आपको आज सामान्य हिन्दुओंके घरोंमें स्वरक्षा हेतु भी एक लाठी तक नहीं मिलेगी ! इसलिए आज वह अहिन्दुओंद्वारा अपने ऊपर होनेवाले आघातोंके प्रतिकार हेतु सामूहिक रूपसे दीप जलाकर अपना विरोध व्यक्त करता है ! किसी भी व्यक्ति या वस्तुकी अति, विनाशका कारण बनती है, हिन्दुओंका अति शान्तिप्रिय या अति सहिष्णु होना ही उनके पतनका कारण है !



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