दिसम्बर ३०, २०१८
महाराष्ट्रके रैगड जनपदमें एक गांव है ‘फौजी अम्बावडे’ । इस गांवमें लगभग ३०० परिवार रहते हैं और प्रत्येक घरमें एक सैनिक है ! यह प्रकरण आजसे नहीं, वरन दीर्घ कालसे चला आ रहा है । पहले यहांके लोग ‘ब्रिटिश इण्डियन आर्मी’में थे और अब भारतीय सेनामें हैं । गांवके नामके पीछे भी विचित्र कहानी है । ‘इकोनॉमिक टाइम्स’के विवरणके अनुसार, १९७४ से १९९४ के मध्य गांवके सरपंच रहे वासुदेव पवार यहांके इतिहासके बारेमें बताते हैं, “१६ शताब्दीसे ही हमारा गांव अपनी वीरताके कारण जाना जाता रहा है । मुगलोंकी सेनाको खदेडनेके लिए हमारे गांवके वीर लोगोंने कई बार छत्रपति शिवाजीके लिए युद्ध लडे । देशभक्ति यहांके लोगोंकी नस-नसमें है । लगभग ३०० पूर्व सैनिक यहां रहते हैं और इतनी ही संख्यामें यहांके युवक भारतीय सेनामें हैं ।”
पवार आगे कहते हैं, “गांवके कुछ परिवार पुणे और मुम्बई रहने चले गए । ऐसेमें मुझे सम्पूर्ण संख्या स्मरण नहीं है, परन्तु गत दिवसोंमें कोल्हापुरमें हुई रैली प्रवेशके समय गांवके दो युवकोंने सभी परीक्षण उत्तीर्ण किए और मराठा पैदल सेनामें प्रविष्ट हुए । कुछ सप्ताहमें वे मराठा सैनिक बन जाएंगे ।” वर्ष १९८१ तक इस गांवका नाम ‘अम्बावडे’ था । इसके पश्चात तत्कालीन मुख्यमन्त्री एआर अन्तुल्यने गांवका नाम परिवर्तितकर ‘फौजी अम्बावडे’ कर दिया क्योंकि गांवके प्रत्येक घरसे एक व्यक्ति सेनामें थे ।
गांवका ब्यौरा यह बताता है कि फौजी अम्बावडे गांवके ५६५ सैनिक स्वतन्त्रताके पश्चात देशके लिए युद्ध लडे हैं । वर्ष २००० तक गांवमें २७ कनिष्ठ कमीशंड अधिकारी, ९ मानद कप्तान और वीरता पदक विजेता थे । इनमेंसे एकको सेना पदक भी मिला था । गांवके लोग यह भी कहते हैं कि हमारे पूर्वजोंने प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्धमें युद्ध लडा था तथा उन्हें अंग्रेजोंसे सम्मान भी मिला था । प्रथम विश्व युद्धके समय मेसोपोटामियामें (इराक) लडते हुए १११ सैनिक हुतात्मा हुए थे, जिनमेंसे पांच इस गांवके थे । उन पांच हुतात्माओंकी स्मृतिमें गांवमें स्मारक भी बना हुआ है ।
इसी प्रकार गांवके कई अन्य सैनिकोंके बारेमें भी ग्रामीण प्रायः चर्चा करते हैं । गांवके रहने वाले ११वीं कक्षाके छात्र आकाश पवार कहते हैं, “हमारे गावंके युवक दूसरे क्षेत्रमें आजीविकाके लिए सोचते भी नहीं हैं । हमारे गांवका एक समृद्ध इतिहास रहा है । हमें इसपर गर्व है । मैं भी सैनिक बन देशकी सेवा करना चाहता हूं ।” यद्यपि, गांवके पूर्व सैनिकोंकी मांग है कि जिसप्रकारसे गोरखाके लिए शरीरकी ऊंचाईमें छूट दी जाती है, उसी तरह यहांके लोगोंको भी छूट दी जाए ।
“इसप्रकारके गांव आज भी वास्तविक भारतकी, जिसकी माटीमें शिवाजी जैसे शूरवीर हुए थे, स्मृति संजोए हुए हैं और ये गांव ही हमारे अभिमानका प्रतीक है । जिसप्रकार आजके गांव व युवा अपनी सांस्कृतिक धरोहरको छोड तथाकथित आधुनिकतामें अन्धी दौड दौडे जा रहे हैं, ऐसेमें ऐसे गांव ही आशाका एक स्रोत हैं ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जनसत्ता
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