‘सन्तोंके आश्रमका अन्न बासी नहीं होता हैं’, इस लघु लेखके सम्बन्धमें एक पाठकने लिखकर भेजा है कि त्रिगुणातीत सन्त दुर्लभ होते हैं ! यह सत्य है कि ऐसे सन्त दुर्लभ होते हैं; किन्तु आज भी ऐसे सन्तोंके कारण ही यह पृथ्वी इतने पापियोंका भार सहते हुए भी टिकी हुई है, यह कदापि नहीं भूलना चाहिए ! दूसरी बात यह है कि सन्तोंके आश्रममें गुरु परम्पराके सन्तोंकी स्तुति, प्रार्थना एवं पूजन होते हैं ! ऐसी परम्परामें हुए कुछ सन्त देह त्यागके पश्चात उत्तरोत्तर आध्यात्मिक प्रगतिकर पूर्ण रूपसे त्रिगुणातीत होकर ईश्वरसे एकरूप हो जाते हैं एवं जब उस गुरु परम्पराके सन्तोंकी उपासना आश्रमके साधक या भक्तगण करते हैं तो ईश्वरीय तत्त्व उनका रूप धारणकर कार्यरत हो जाता है और इसकी प्रतीति मैंने प्रत्यक्षमें ली है ! इसलिए मैंने कलके लेखमें स्थूल और सूक्ष्म रूपसे उपस्थित रहनेवाले त्रिगुणातीत, यह शब्द प्रयोग किए हैं ! यह सत्य है कि त्रिगुणातीत सन्तोंका मिलना दुर्लभ है; किन्तु सौभाग्यसे या ईश्वरीय कृपासे ऐसे एक-दो सन्तोंसे मिल चुकी हूं ! अब उनके नाम न पूछें, ऐसे सन्त आपको भी मिलें, इस हेतु साधना करें !
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