जनताके धनका अपव्ययकर कांग्रेसने संसदमें उडाए कागदके (कागजके) यान !!


जनवरी २, २०१८

लोकसभामें बुधवार, २ जनवरीको ‘राफेल सन्धि’पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधीके आरोपोंपर जब वित्त मन्त्री अरुण जेटली उत्तर दे रहे थे, तभी विपक्षी नेताओंने तो पहले कोलाहल किया, तदोपरान्त सत्ता पक्षकी ओर कागदके (कागजके) बने हवाई जहाज उडाकर फेंकने लगे । सदनमें इस स्थितिको देखकर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन बिफर पडीं ! उन्होंने कांग्रेसी सांसदोंको ऐसा नहीं करनेको कहा, परन्तु विपक्षी नेता तब भी नहीं माने । इसके पश्चात अध्यक्षाने व्यंग्य किया, “आपलोग बच्चे नहीं हो, बचपनमें कागदके जहाज नहीं उडाए थे क्या ?, जो आज उडा रहे हो ।” जब इसपर भी विपक्षी नेताओंने कोलाहल करना आरम्भ कर दिया तो स्पीकरने सदनकी कार्यवाही दोपहर साढे तीन बजे तक स्थगित कर दी ।


इससे पूर्व जब राहुल गांधी राफेलपर चर्चा कर रहे थे, तब सदनको ढाई बजे तकके लिए कुल पांच मिनटके लिए स्थगित किया गया था । राहुल गांधीने ‘स्पीकर’से सदनमें उस ध्वनिमुद्रणको (ऑडियो टेप) सुनानेकी आज्ञा मांगी थी, जिसमें कथित रूपसे पूर्व रक्षा मन्त्री मनोहर पर्रिकरकी ध्वनि है कि उनके घरपर राफेल सन्धिसे सम्बन्धित सभी लिखित-पत्र हैं । राहुलकी मांगपर लोकसभामें हंगामा होने लगा । लोकसभा स्पीकरने राहुल गांधीको इसकी आज्ञा नहीं दी तो विपक्षी सांसदोंने हंगामा किया । ‘स्पीकर’ने कहा कि यदि आप इसकी पुष्टि करते हैं और इसका उत्तरदायित्व लिखितमें देते हैं, तभी चला सकते हैं ।

राहुल गांधीने अपने भाषणमें प्रधानमन्त्रीपर लक्ष्य साधा और कहा कि वो छिप रहे हैं । उन्होंने अनिल अम्बानीको ‘डबल ए’ कहकर पुकारा और कहा कि प्रधानमन्त्रीने अपने इस मित्रको लाभ पहुंचानेके लिए शासकीय कम्पनीको ‘राफेल’का ठेका नहीं मिलने दिया । उधर, गांधीके आक्षेपोंपर जेटलीने उत्तर देते हुए कहा कि राहुल गांधीने पिछली बार पूर्व फ्रांसिसी राष्ट्रपतिसे भेंट की, वार्तामें छेडछाड कर लोगोंके सामने रखा था और आज वही चीज पुनरावृत्ति कर रहे हैं ।

 

“भारतके सहस्रों वीरोंने स्वतन्त्र करनेके लिए प्राण दिए, ताकि हम स्वतन्त्र होकर राष्ट्रको आगे बढाएं । उसके पश्चात लोकतन्त्रका निर्माण हुआ, ताकि हमें नेतृत्व शक्ति युक्त नेता मिलें । संसदकी कार्यवाहीपर नागरिकोंकेद्वारा प्रदत्त करके कोट्यावधि रूपये व्यय होते हैं और उन्हीं रूपयोंको कूडेदानमें डालकर नेता कागदके यान उडानेमें व्यस्त है !! क्या नेता सेवक है तो क्या उसे यह अधिकार है ? ऐसे बौद्धिक स्तरके नेता क्या शासन योग्य है ? क्या स्वतन्त्रता सेनानियोंकी आत्माएं यह सब देख क्रन्दन नहीं करती होंगीं ? अब इन नेताओंको समझाना व्यर्थ ही है, क्योंकि यह संस्कारमें आ चूका है; अतः अब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना कर ही इसका समाधान सम्भव है”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : जनसत्ता



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