व्यावहारिक जीवनमें कष्ट अधिक होनेके कारण सकाम भक्तिके प्रति सहज आकृष्ट होना
कलियुगी जीवके जीवनमें प्रारब्धकी तीव्रता अधिक होनेके कारण कष्टका या दुःखका प्रमाण अधिक होता है । अन्य युगोंकी अपेक्षा धर्मके तीन अंगोंका पतन हो जानेके कारण सामान्य व्यक्ति धर्म एवं साधनाको इतना महत्त्व नहीं देता; अतः अनिष्ट शक्तियोंका (सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियोंका) कष्ट भी अधिक होता है । ऐसी स्थितिमें शरणागतिका भाव रख, आध्यात्मिक प्रगति करना सरल मार्ग है । भक्तियोगमें साधक पहले सकाम अर्थात अपेक्षाके साथ साधना करता है और अपेक्षा पूर्ण होनेपर अर्थात अनुभूति होनेपर धीरे-धीरे भक्ति बढती है और साधकका सकामसे निष्काम भक्तिकी ओर मार्गक्रमण होने लगता है । निष्काम भक्तिसे आध्यात्मिक प्रगति होती है और साधक, साधना पथपर अग्रसर होने लगता है ।
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