भक्तियोग कलियुगकी अधिक योग्य एवं सबसे प्रचलित साधना क्यों ? (भाग-५)  


भक्तियोगद्वारा सभी योगमार्गसे साध्य होनेवाली स्थितिको प्राप्त करना सम्भव
भक्तियोग अंतर्गत नामसंकीर्तनयोगका मार्ग अनुसरण करनेसे जब नामजप अखण्ड हो जाता है, तब जागृतावस्थामें ही ध्यान साध्य हो जाता है ।
जब नामजप अखंड हो जाये तब कर्म भी अकर्म होने लगते हैं अर्थात कर्मफलका सिद्धान्त लागू नहीं होता, अतः कर्मयोग भी साध्य हो जाता है । ॐ अर्थात ईश्वरका निर्गुण स्वरूप या नाम है, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि और वेदकी निर्मिति हुई है, अतः नामके साथ एकरूप हुए साधकको सर्वज्ञताकी भी अनुभूति स्वतः ही हो जाती है जो ज्ञानयोगसे साध्य होता है । यह कोई न भूले कि ज्ञानमार्गी उद्धवको भक्तिकी पराकाष्ठाकी अनुभूति लेनेवाली गोपियोंने ज्ञान दिया था !



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