जनवरी ८, २०१९
नियन्त्रक और महालेखा परीक्षकने (कैग) दूरसंचार मन्त्रालयद्वारा ‘स्पेक्ट्रम’ प्रबन्धनमें कई चूकें पाई हैं, जिनके चलते शासकीय कोषको कोट्यावधि रूपयोंकी हानि हुई है । ‘पीटीआई’के अनुसार ‘कैग’ने पाया कि २०१५ में समितिकी सुझावोंके विरुद्ध ‘पहले आओ पहले पाओ’के आधारपर एक ‘टेलिकॉम’ संचालकको ‘स्पेक्ट्रम’ आवण्टित किया गया, जबकि ‘माइक्रोवेव (एमडब्ल्यू) स्पेक्ट्रम’के लिए १०१ आवेदन शासनके पास लम्बित थे । ‘कैग’ने अपने विवरणमें कहा कि दूरसंचार विभागने दिसम्बर २०१२ में ‘स्पेक्ट्रम’ उपयोगकर्ताओंकी विभिन्न श्रेणियोंमें ‘स्पेक्ट्रम’के आवण्टनको देखनेके लिए एक समितिका गठन किया था और प्रस्तावित किया था कि सभी संचालकोंको सूक्ष्म तरंग पट्टीमें (माइक्रोवेव बैंडमें) ‘स्पेक्ट्रम’का आवण्टन सार्वजनिक विक्रयके (नीलामीके) माध्यमसे किया जाना चाहिए । विवरणमें कहा गया कि समितिकी परामर्शके विरुद्ध अब तक सूक्ष्म तरंग संचालित पट्टीको (माइक्रोवेव एक्सेस स्पेक्ट्रमको) ‘पहले आओ पहले पाओ’के आधारपर आवण्टित किया गया जैसा कि २००९ तक ‘२जी अनुमतिपत्र’ (लाइसेंस) और अभिगम पट्टीके (एक्सेस स्पेक्ट्रम) लिए किया जा रहा था ।
२०१२ में उच्चतम न्यायालयने २००८-०९ के २जी पट्टी (स्पेक्ट्रम) आवण्टन प्रकरणमें ‘पहले आओ पहले पाओ नीति’को रद्द कर दिया था । इस प्रक्रियाके माध्यमसे दिए जानेवाले ‘स्पेक्ट्रम’के लिए १२२ दूरसंचार आज्ञापत्र (परमिट) रद्द कर दिए गए थे । अल्प दूरीके लिए भ्रमणभाष सेवाओंको प्रदान करनेके लिए दूरसंचार संचालकोंको ‘माइक्रोवेव एक्सेस स्पेक्ट्रम’ आवण्टित किया जाता है । कम्पनीका नाम बताए बिना ‘सीएजी’ने कहा, “यह भी पाया गया कि ‘एक्सेस सेवा प्रदाताओं’को ‘माइक्रोवेब एक्सेस’का आवण्टन दूरसंचार विभागद्वारा जून २०१० से रोक दिया गया था और दिसम्बर २०१५ में केवल एक आवेदकके विरुद्ध आवण्टन किया गया था ।
‘माइक्रोवेब एक्सेस’के आवण्टनके लिए नवम्बर २०१६ तक १०१ आवेदन लम्बित थे । ‘सीएजी’के विवरणके अनुसार दूरसंचार विभागके ‘स्पेक्ट्रम’ कुप्रबन्धनकी विभिन्न घटनाओंसे शासनपर लगभग ५६० कोटि रुपयोंका वित्तीय प्रभाव पडा । कुल हानिमें, नियामकने ‘बीएसएनएल’से ‘स्पेक्ट्रम’ वापस न लेनेके कारण शासकीय कोषपर ५२०.७९ कोटि रुपयोंका अधिकतम वित्तीय प्रभाव देखा ।
“स्वतन्त्रता पश्चात देशकी राजनीति व लोभी राजनेताओंके कारण ही देशकी इतनी दुर्गति हुई है कि न ही प्राकृतिक और न ही कृत्रिम संसाधनोंका योग्य प्रकारसे प्रयोग किया गया, जिससे वस्तुएं कुछ एक व्यक्ति विशेषके हाथमें ही सिमटकर रह गई । शासनकर्ताओंकी तथाकथित उदारीकरण व वैश्वीकरणकी नीतियोंने देशका सम्पूर्ण धन विदेशियोंके हाथोंमें दिया है और शेष देशका धन कुछ लोगोंके हाथमें रह गया, जिसके कारण आजभी भारतवर्ष सर्वसम्पन्न होते हुए भी दासताके चिह्नोंको छुडा नहीं पाया है; अतः अब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना ही एकमात्र उपाय है ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जनसत्ता
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