संसदके अधिवेशन मछली बाजार समान !


आजका समाज कितना बहिर्मुख है, यह यदि देखना चाहते हैं तो संसदके अधिवेशनोंको देखना चाहिए ! समाजके चयनित प्रतिनिधि किस प्रकार संसद जैसे पवित्र स्थानको एक दुर्गन्धयुक्त मछली बाजार सामान बना देते हैं, वह स्पष्ट दिखाई देता है ! स्वार्थ, द्वेष, सत्तान्धता, अवसरवादिता, राष्ट्रद्रोह एवं धर्मद्रोह जैसे दुर्गुणोंसे युक्त लोक प्रतिनिधियोंने लोकतन्त्रको वह स्वरुप दे दिया है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है ! इन सबका एकमात्र पर्याय एक सशक्त हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना है !



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