स्वतन्त्रताके इतने दशक पश्चात भी इस देशके अन्नदाता दरिद्रता और ऋणके बोझके कारण करते हैं आत्महत्या, क्या हम सचमें स्वतन्त्र हुए हैं ?
देशमें ३ वर्षमें ३६००० किसानोंने दिए प्राण, हर किसान परिवारपर है ४७ सहस्रका ( हजारका) ऋण । केंद्र शासनने मंगलवारको बताया कि देशमें ५२ प्रतिशत कृषक परिवारोंके ऋणी होनेका अनुमान है और प्रति कृषि परिवार बकाया औसत ऋण ४७००० रुपए है । इसके अतिरिक्त देशमें वर्ष २०१४ से २०१६ तक, तीन वर्षोंके मध्य ऋण, दिवालियापन एवं अन्य कारणोंसे करीब ३६ सहस्र किसानों एवं कृषि श्रमिकोंने आत्महत्या की है । लोकसभामें अधिवक्ता जोएस जार्जके प्रश्नके लिखित उत्तरमें कृषि मंत्री राधामोहन सिंहने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालयके कृषि वर्ष जुलाई २०१२ से जून २०१३ के संदर्भके लिये देशके ग्रामीण क्षेत्रोंमें ७० वें राउंडके कृषि परिवारके सर्वेक्षण आंकडोंके आधारपर यह बात कही । सिंहने बताया, ‘प्रति कृषि परिवार बकाया ऋणकी औसत राशि ४७००० रुपए थी ।
अनादिकालसे हमारा देश कृषि प्रधान देश रहा है । जब इस देशका किसान समृद्ध था तब यह देश सोनेकी चिडिया कहलाता था । मुसलमान आक्रान्ताओंने इस देशके किसानोंपर करोंका बोझ लादनेका क्रम आरम्भ किया और उसके पश्चात अंग्रेजोंके उत्पीडनने किसानोंकी स्थितिको और विकट कर दी; किन्तु स्वतन्त्रता पश्चात किसानोंकी स्थितिमें कोई भी सुधार नहीं हुआ है एवं किसानोंकी आत्महत्या अब किसीको चौंकाती नहीं है; अपितु अन्नदाताकी इतनी बडी संख्यामें होनेवाली आत्महत्याओंको रोकने हेतु अबतक कोई ठोस उपाय योजनाका नहीं निकाला जाना, इस देशके राज्यकर्ताओंकी, उनके प्रति निष्ठुरताको स्पष्ट दर्शाता है । ‘राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय’द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकडोंके अनुसार, १९९५ से २०११ के मध्य अर्थात १७ वर्षोंमें ७ लाख, ५० हजार, ८६० किसानोंने आत्महत्या की है । वर्ष २०१४ से २०१५ के मध्य किसानोंकी आत्महत्याओेंमें ४१.७ प्रतिशतकी वृद्धि हुई है । २००१ की जनगणनाके आंकडे बताते हैं कि पिछले दस वर्षोंमें ७० लाख किसानोंने खेती करना बन्द कर दिया । क्या यह इस देशके लिए शुभ सन्देश है ? किसानोंके आत्महत्याका क्रम १९९० के दशकसे महाराष्ट्रसे आरम्भ हुआ, जो अब देशके अनेक राज्योंतक फैल चुका है । किसान बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक औषधियों एवं छोटे क्षेत्रफलकी भूमिके स्वामी होनेके कारण अपनी आर्थिक आवश्यकताओंकी पूर्ति नहीं कर पाते हैं और वे ऋण लेते हैं । सूखा, बाढ, पाला, फसलोंके रोग, कीडों, अग्नि (आगजनी) व पशुओं इत्यादिके कारण किसानोंको अधिकतर लाभके स्थानपर हानि उठानी पडती है; ऊपरसे ‘सूदखोर’ महाजनोंका मकडजाल, जो बैंककी अपेक्षा तीन गुना अधिक ब्याज लेते हैं, वह किसानोंको उनकी आर्थिक दरिद्रतासे बाहर नहीं निकलने देता; किन्तु मूलत: किसानोंकी उपजके लिए अपर्याप्त और न्यून (कम) क्रय मूल्य वर्तमान कृषिसंकटका आधार है और इससे निराश होकर वे न केवल अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं; अपितु अपने पूरे परिवारको मृत्युकी नींद सुला देते हैं । विकासकी डींगें हांकनेवाले अभीतकके सर्व राजनीतिक पक्ष किसानोंकी खेती हेतु उचित सिंचाई व्यवस्था करनेमें भी असक्षम रही हैं । किसानोंको सहायता पहुंचानेके लिए केन्द्र और राज्य शासन, दोनों एकदूसरेपर उत्तरदायित्व डालते हैं और वे किसानोंकी आत्महत्याओं और उन्हें दी जानेवाली सहायताको लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकने लग जाते हैं । किसानके ऋणमें डूबने या घाटेमें जानेका एक और बडा कारण है, खेतोंमें कीटनाशकका छिडकाव । कीटनाशक और रासायनिक उर्वरकका प्रयोग अल्प भूमिमें अधिक फसल करनेके नामपर आरम्भ किया गया था । जिसे हरित क्रान्तिका नाम दिया गया था । इस हरित क्रान्तिने किसान, फसल और सामान्य लोगोंके जीवनमें विष घोलनेका कार्य किया, इनको प्रयोग करना विवशता बन चुकी है । यदि यह सब न हो तो किसानोंकी खेतीका लागत मूल्य इतना अधिक नहीं बढेगा और अब तुरन्त इसका उपाय जैविक उर्वरक आधारित खेती नहीं हो सकती; क्योंकि भूमिको पुनः ठीक होनेमें ३ से ४ वर्षका समय लग जाता है । कृषि हमारे देशकी अर्थव्यवस्थाका आधार है; अतः किसानोंके विकासका उत्तरदायित्व राज्यकर्ताओंके लिए प्राथमिकता होनी चाहिए थी । कृषिको हरित क्रान्तिके नामपर दिशाहीन किया गया । यदि कृषि देसी गोवंश आधारित होती, सिंचाईं व्यवस्थाको प्राथमिकता दी जाती, किसानोंको उसकी उपजका उचित मूल्य मिलता और मध्यस्थों और महाजनोंके चुंगलसे वे मुक्त रहते, तो कृषक आत्महत्या क्यों करते ? यथार्थमें इस देशमें अब राज्यकर्ताओंके लिए ‘जय जवान जय किसान’के घोषवाक्यका (नारे) कोई अर्थ नहीं रहा । अब ‘मरे जवान मरे किसान; किन्तु हम करते रहेंगे, आ गए अच्छे दिनका गुणगान’ यह घोषवाक्य चरितार्थ हो रहा है ! इस दुर्दिनको शीघ्र दूर करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना, अब एकमात्र पर्याय रह गया है । – तनुजा ठाकुर, संस्थापिका, वैदिक उपासना पीठ
Leave a Reply