मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – ३)


मांसाहारको एक निन्दनीय कृत्य मानकर हमारे धर्मग्रन्थोंने उसे पापकर्म माना है एवं उसमें लिप्त प्रत्येक व्यक्ति किसप्रकार पापके अधिकारी बनते हैं, इस सम्बन्धमें मनुस्मृतिका यह श्लोक उल्लेखनीय है –
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ – मनुस्मृति ५:५१
अर्थात मारनेकी आज्ञा देनेवाला, पशुको मारनेके लिए लेनेवाला, विक्रय करनेवाला, पशुको मारनेवाला, मांसको क्रय एवं विक्रय करनेवाला, मांसको पकानेवाला और मांस खानेवाला, ये सभी हत्यारे हैं ।
कुछ लोग मांसका व्यापार करते हैं; किन्तु वे मांसाहार नहीं करते हैं ; ऐसे लोगोंने यह नहीं भूलना चाहिए कि वे भी उपर्युक्त श्लोक अनुसार उतने ही बडे पापके अधिकारी होते हैं !
पापका फल परलोकमें नरक यातना भोगकर एवं पृथ्वीपर दुःखके रूपमें भोगना पडता है; इसलिए विवेकी मनुष्यने जानबूझकर ऐसे कर्मोंको त्यागना चाहिए ! मात्र तीन इंचकी जिह्वाकी तृप्ति हेतु दूसरे जीवके प्राण हर लेना, उसका मांस भक्षण करना, यह मात्र तमोगुणसे आवेशित मनुष्य ही कर सकता है !  



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