शास्त्र कहता है, ‘अधर्म एवं मूलं सर्व रोगानां’, अर्थात इस जन्ममें या अगले जन्ममें हमारेद्वारा किया गया अधर्म ही हमारे दुखोंका मूल कारण होता है; इसलिए ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए कि हमें दुःख भोगना पडे; क्योंकि दुःखकी कल्पना कोई नहीं करता है और उसे सहन करना भी अत्यधिक कठिन होता है; इसलिए क्रियामाणसे ऐसी कोई भी कृति नहीं करनी चाहिए, जिसे शास्त्रोंमें अधर्म कहा गया हो, अन्यथा कर्मफल सिद्धान्त अनुसार, हमें इस जन्ममें या अन्य किसी जन्ममें उसका परिणाम तो भोगना ही पडता है और मात्र अपने सुखके लिए या अपनी वासनाओंकी तृप्ति हेतु किसीका वध करना तो महापाप होता है ! शास्त्र कहता है –
योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।
स जीवंश्च मृत्श्चैव न क्वचित् सुखमेधते ॥
अर्थ : जो अहिंसक और निर्दोष प्राणियोंको खाने आदिके लिए, अपने सुखकी इच्छासे मारता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पाता; क्योंकि अधर्मीको कभी सुख नहीं मिलता । पापका ही तो फल दुःख है ।
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