‘पुरोहित बननेके लिए आवश्यक घटक’, इस लेखसे सम्बन्धित एक व्यक्तिने अपनी शंकाको व्यक्त करते हुए पूछा है कि क्या मात्र उत्तर भारतके पण्डितोंके ही संस्कृत उच्चारण ठीक नहीं होते हैं ?
मैंने उसमें लिखा था कि कर्मकाण्डकी विधियां करवाते समय, उत्तर भारतके ७० % पण्डितोंके उच्चारणमें मैंने अशुद्धियां पाई हैं ! मेरा कार्यक्षेत्र उत्तर भारत रहा है और मैंने जो अनुभव किया है, वह मात्र इसलिए बताती हूं कि उसे सुधारा जा सके ! समष्टि साधना अर्थात धर्मप्रसारके मध्य अनेक बार दक्षिण भारत भी जाना हुआ है; किन्तु ऐसे प्रसंग नहीं निर्माण हुए कि वहांके कर्मकाण्डकी विधियोंको बहुत बार देख पाऊं । दो-चार बार देखा था; किन्तु वे वृहद स्तरके कार्यक्रम थे और कर्ता, प्रकाण्ड विद्वान पण्डित थे; इसलिए उनके उच्चारण भी शुद्ध थे ! दो चार प्रसंगसे आप किसी क्षेत्रके विषयमें टीका नहीं कर सकते हैं; इसलिए मैंने सम्पूर्ण भारत नहीं लिखा था ! मेरा प्रयास रहता है कि जो अनुभव किया है और यदि उसमें कुछ चूक हो रही है तो उसे सुधारा जाए; क्योंकि हम अपने धर्मबन्धुओंकी चूकोंको नहीं बताएंगे तो क्या कोई अहिन्दू या विदेशी आकर बताएगा ? विशुद्ध उद्देश्यको लेकर ही सब बतानेका प्रयास करती हूं; प्रांतवाद, जातिवाद या किसी विशेष वर्गके ऊपर कटाक्ष करना मेरा उद्देश्य नहीं होता । समीक्षकने सदैव तटस्थ होकर ही अपनी अभिव्यक्ति देनी चाहिए, ऐसा शास्त्र कहता है !
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