सीबीआई निदेशक न बन पानेपर डीजीपी अहमदने खेला ‘एम’ कार्ड, पत्रकार आशुतोषका भी ब्राह्मण विरोधी जातिवादी वक्तव्य !!


जनवरी ३, २०१९


शनिवार, १ फरवरीको ‘केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो’के नूतन निदेशकके नामकी घोषणा हुई । मध्यप्रदेशके पूर्व डीजीपी ऋषि कुमार शुक्लाको सीबीआईका नया निदेशक नियुक्त किया गया । प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, उच्चतम न्यायालयके मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और लोकसभामें विपक्षके नेता मल्लिकार्जुन खडगेकी तीन सदस्यीय समितिने ‘२-१’के बहुमतसे यह निर्णय लिया । मल्लिकार्जुन खडगे शुक्लाको निदेशक बनानेके विरुद्घ थे ।

अब एक ओर कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष शुक्लाकी योग्यतापर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है, तो दूसरी ओर तथाकथित बुध्दिजीवी वर्गने उनपर ब्राह्मण और हिन्दू होनेका ठप्पा लगा दिया ! इसी क्रममें उत्तर प्रदेशके पूर्व  पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) जावीद अहमदने और पत्रकार और पूर्व ‘आप’ नेताने भी अपना पक्ष रखा है । आशुतोषने ट्विटकर कहा कि ‘शुक्लाजी तो हो गए सीबीआई निदेशक, क्या कभी कोई दलित भी होगा ?’ लोगोंने आशुतोषके विरुद्घ इसपर भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं दी !

कुछ इसीप्रकार ही किया पुलिस महानिदेशक जावीद अहमदने, जो ‘सीबीआई’ निदेशक बननेकी दौडमें सम्मिलित थे । शनिवारको नामकी घोषणा होनेके पश्चात जैसे ही यह समाचार आया, जावीद अहमदने शुक्लाकी नियुक्तिको लेकर धर्मको लेकर बात कह दी !

यह बात एक ‘व्हाट्सएप चैट’में ज्ञात हुई । ‘आईपीएस ऑफिसर’नामसे उत्तर प्रदेशके पुलिस अधिकारियोंका एक व्हाट्सएप गुट है । जब शुक्लाकी नियुक्तिका समाचार किसीने साझा किया तो जावीद अहमदने लिखा, “अल्लाहकी इच्छा । बुरा लगता है; परन्तु ‘एम’ होना अपराध है ।”

उल्लेखनीय है कि शुक्ला १९८३ दलके (बैचके) आईपीएस अधिकारी हैं, जबकि अहमद १९८५ के आईपीएस अधिकारी हैं । इसप्रकार श्री शुक्ला, अहमदसे दो वर्ष वरिष्ठ हुए; इसलिए केन्द्रने आरके शुक्लाको निदेशकका पद सौंपा ।


“एक इतने बडे पदपर बैठा व्यक्ति, जो अपने ही एक वरिष्ठ अधिकारीके लिए बोलता है कि मुझे नहीं मिला, इन्हें क्यो ?, यह हास्यास्पद ही है । यदि ‘एम’ होना वास्तवमें दोष होता तो क्यों यह देश बडे-बडे पदोंपर ‘एम’को बैठाता ? यह तो वह देश है, जो यह ज्ञात होनेपर भी कि मस्जिदें आतंक प्रसारित करनेका कार्य कर रही है, तब भी न ही मस्जिदों, न ही ‘एम’पर और न ही मौलवियोंपर कार्यवाही करता है, तब भी इन्हें यह अनर्गल वक्तव्य कैसे सूझता है ? इतने वर्ष उच्च पदपर आसीन रहनेके पश्चात वास्तविकताका बोध करवाते हुए केवल धर्मान्धताका ही परिचय दिया है ।  इससे वे अपने कनिष्ठ पुलिस अधिकारियोंको क्या शिक्षा दे रहे हैं ? केन्द्रको इसमें हस्तक्षेपकर उचित कार्यवाही करे, यह समस्त राष्ट्रवादियोंकी मांग है । देश नहीं चाहता कि ऐसी मानसिकताका व्यक्ति आगे कभी सीबीआई निदेशक चुना जाए और टत्रकार आशुतोषको भी लज्जा आनी चाहिए । पत्रकारका कार्य है वास्तविकता दिखाना; परन्तु आशुतोष सदृश पत्रकार पत्रकारिताके नामपर कलंक हैं, जो देशको जातियोंमें विभाजित कर रहे हैं ! एक महत्वपूर्ण पदके लिए दलित नहीं योग्यता आवश्यक है, यह सरलसा तथ्य इन राष्ट्रद्रोहियोंके समझमें नहीं आता है !!”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : ईपोस्टमोर्टम & जनसत्ता



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