भगवानसे प्रार्थना कैसे करनी चाहिए ?, इस विषयमें एक शास्त्र वचन कहता है –
आदरेण यथा स्तौति धनवन्तं धनेच्छया ।
तथा चेद्विश्चकर्तारं को न मुच्येत बन्धनात् ॥
अर्थ : धनलालसासे जिसप्रकार धनवानकी स्तुति (इन्सान) करता है, वैसे यदि विश्वकर्तासे (भगवानसे) प्रार्थना करे, तो कौन बंधन मुक्त न हो ? अर्थात अध्यात्ममें सब कुछ हम जिस भावसे करते हैं, इसपर ही ईश्वरीय तत्त्व कार्य करता है ।
नामजप करते समय हमारा भाव कैसा होना चाहिए ?, जिससे वह ईश्वर चरणोंतक पहुंचे, इसके विषयमें अब हम एक-एककर कुछ तथ्य जानेंगे । यह भी आपको क्यों बता रहे हैं ?, क्योंकि अनेक लोग, अनेक वर्ष नामजप करते हैं; किन्तु उनकी आध्यात्मिक उपलब्धि कुछ नहीं होती है ! कारण है, नामजप कुछ काल उपरान्त यन्त्रवत (मैकेनिकल) होने लगता है ।
कबीर दासजी ने इस सम्बन्धमें बहुत सटीक कहा है –
माला फेर जग गया मिटा न मनका फेर |
करका मनका छाडी के मनका मनका फेर ||
नामजप करते समय वह भावपूर्वक हो, इस हेतु कुछ प्रयास इस प्रकार करें ।
भावपूर्वक नामजप करने हेतु प्रयास (भाग -१)
अ. नामजप आर्त भावसे करें । जैसे एक प्यासेको अत्यधिक प्यास लगी हो और उसे कहीं कोई घर दिखाई दे तो वह किसप्रकार जल पिलानेकी याचना करेगा ?, उसी याचक भावसे नामजप करें !
आ. यदि आप किसीसे प्रेम करते हैं तो उसे अपने निकट बुलानेके लिए कितने प्रेमसे उसे बुलाते हैं, उसीप्रकार अपने आराध्यका भी नामजप प्रेमसे करें कि वे आपकेद्वारा बुलानेपर अवश्य उपस्थित हो जाएं । नामजपसे देवताका तत्त्व सर्वप्रथम हमारे निकट और उसके पश्चात हमारे भीतर वास करने लगता है ! अर्जुनके तो रोम-रोमसे कृष्णकी ध्वनि आती थी, ऐसा शास्त्रोंमें लिखा है !
नामजपमें संख्यात्मक वृद्धि हेतु सर्वप्रथम अधिकसे अधिक नामजप करना चाहिए; किन्तु उसके पश्चात उसमें गुणात्मक वृद्धि होना अति आवश्यक होता है । भावपूर्वक नामजपसे इसकी गुणवत्ता वृद्धिंगत होने लगती है और साधक आनन्दके महासागरमें डुबकियां लेने लगता है !
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