जनवरी ८, २०१९
उच्चतम न्यायालयने शुक्रवार, ८ फरवरीको कहा कि उसे ऐसा लगता है कि मायावतीको लखनऊ और नोएडामें अपनी तथा बसपाके चुनाव चिह्न हाथीकी प्रतिमाएं बनवानेपर व्यय किया गया । सारा शासकीय कोष लौटाना होगा । प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्नाकी पीठने एक अधिवक्ताकी याचिकापर सुनवाईके समय यह टिप्पणी की । अधिवक्ता रवि कांतने २००९ में प्रविष्ट अपनी याचिकामें कहा कि सार्वजनिक धनका प्रयोग अपनी प्रतिमाएं बनवाने और राजनीतिक दलका प्रचार करनेके लिए नहीं किया जा सकता । पीठने कहा, ‘‘हमारा ऐसा विचार है कि मायावतीको अपनी और अपनी पार्टीके चुनाव चिह्नकी प्रतिमाएं बनवानेपर व्यय हुआ सार्वजनिक धन शासकीय कोषमें वापस एकत्र करना होगा ।’’ पीठने कहा कि इस याचिकापर विस्तारसे सुनवाईमें समय लगेगा; इसलिए इसे अप्रैलको अन्तिम सुनवाईके लिए सूचीबद्ध किया जाता है । इससे पूर्व, शीर्ष न्यायालयने पर्यावरणको लेकर व्यक्त की गई चिंताको देखते हुए इस प्रकरणमें अनेक अन्तरिम आदेश और निर्देश दिए थे । यही नहीं, निर्वाचन आयोगको भी निर्देश दिए गए थे कि चुनावके समय इन हाथियोंको ढंका जाए ! याचिकाकर्ताने आरोप लगाया है कि मायावती, जो उस समय उप्रकी मुख्यमन्त्री थीं, उनका महिमामण्डन करनेके लिए इन प्रतिमाओंके निर्माणपर २००८-०९ के समय शासकीय कोषसे कोटि रूपए व्यय किए गए हैं ।
“सगुण साधनाके विधानका सबसे अधिक दुरूपयोग राजनेताओंने किया गया है कि स्वयंको ईश्वर बतानेका प्रया करते हैं । तामसिक राजनेता अपनी प्रतिमाएं बनवाते हैं, जिससे तामसिक किरणें प्रक्षेपित होती है और वातावरण भी तामसिक होता है । देशका अरबों रुपया अपनी मूढताके लिए व्ययकर कोई राजनेता निकल जाते हैं और उन्हें कुछ नहीं कहा जाता है ! यह प्रदर्शित करता है कि इस देशमें राजनेता बन जानेके पश्चात भ्रष्टाचार करनेकी अनुमति मिल जाती है ! हिन्दुओंके विषयपर हस्तक्षेप करनेवाले न्यायालय भी वर्षोंतक मौन रहते हैं !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : नभाटा
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