फरवरी २३, २०१९
देशमें भूजलके व्यापक दोहनसे जलकी न्यूनता होती जा रही है । अब एक विवरणमें दावा किया गया है कि विश्वमें भूजलमें न्यूनताका सबसे अधिक प्रभाव उत्तर भारतमें हो रहा है और देहलीमें यह संकट सबसे तीव्रतासे बढ रहा है और दिनों-दिन यह और भी अधिक गंभीर होता जा रहा है । ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’के अनुसार, ‘नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ने (NGRI) भूजलपर यह शोध की है । निदेशक डॉ. विरेंद्र एम.तिवारीका कहना है कि ‘देहली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थानमें प्रत्येक वर्ष ३२ क्यूबिक किलोमीटर जर नष्ट हो रहा है ।’ बता दें कि एअ क्यूबिक किलोमीटर जल एक ट्रिलियन लीटरके समान होता है ।
डॉ. विरेंद्रके अनुसार, ‘यह सामान्यसे काफी अधिक है और इस नष्ट हुए जलमें से थोडे जलकी ही एक अच्छे मानसूनसे पूर्ति हो पाती है । वहीं सूखाग्रस्त वर्षके समय उत्तरी भारतमें भूजलका दोहन १०० क्यूबिक किलोमीटर तक पहुंच जाता है ।’ वैज्ञानिकोंका कहना है कि भूजलका यह दोहन ‘सेंट्रल ग्राउंडवाटर बोर्ड’द्वारा अनुमानित आंकडोंसे ७०% अधिक है । कुछ विवरणमें कहा गया है कि वर्ष १९९० के पश्चातसे देशमें प्रत्येक वर्ष १७२ क्यूबिक किलोमीटर जलका दोहन किया गया है ।
डॉ. विरेंद्रके अनुसार, हमें इस बातका अनुमान नहीं है कि इस क्षेत्रमें कितना भूजल शेष है; परन्तु यह बात स्पष्ट है कि स्थिति विकट है । नीति आयोगके एक विवरणके अनुसार, देहलीमें वर्ष २०२० तक ही भूजल समाप्त हो सकता है । जनसंख्याके बढने और जलके स्रोतके तीव्रतासे घटनेके कारण इस क्षेत्रमें भूजल अल्प हो रहा है और यह न्यूनता १० सेंटीमीटर प्रति वर्षकी दरसे हो रही है !!
“अधिक पढे-लिखे मैकॉले शीक्षितोंने कुएं, बावडियां, तावाब आदिको नष्ट कर दिया, जो भूमिगत जलको बनाए रखते थे ! उन्हें लगा कि शासन तो मोटरसे जल भेज रहा है तो इनकी हमें क्या आवश्यकता है ! फिर जब मोटरसे जल आया तो कुछ स्वार्थी लोगोंने नलकूप हटाकर भूमि खोदकर ‘बोरवेल’ लगाने आरम्भ किए ! उसके उपरान्त भी अति तब हुई, जब लोगोंने अपने घरके सामनेकी सडक धोना आरम्भ किया, घरमें कुत्ते पालकर उन्हें ५-७ बाल्टियोंसे स्नान करवाना, स्वयं ३-३ बाल्टियोंसे स्नान, फिल्टर जल आदिमें जल व्यर्थ करना आरम्भ किया और अति तो तब की, जब बहुमूल्य जलका प्रयोग वाहन धोनेमें किया ! देहलीमें लाखों वाहन हैं और प्रत्येक वाहन रखनेवाला वाहनको मूढकी भांति २-२ बाल्टी और कोई १०-२० बाल्टी जलसे धोता है !! अब ऐसी स्थितिमें प्रकृति हमें जलसे वंचितकर मरनेके लिए क्यों न छोडे, आप स्वयं ही विचार करें !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जनसत्ता
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