धर्मप्रसारके मध्य उत्तर प्रदेशके एक नगरमें मैं २००२ में एक परिवारमें दो दिन रहा करती थी और शेष दिवस अन्य कुछ आस-पासके जनपदोंमें जाती थी | छ: माह पश्चात, एक दिवस उस घरकी गृहिणी, जिन्हें मैं दीदी कहती थी, उन्होंने कहा, ‘मेरे बच्चे मेरी बात ही नहीं सुनते हैं, मैं क्या करूं ?, मुझे समझमें नहीं आता है, अभी ये छोटे हैं तो यह स्थिति है, बडे होंगे तो पता नहीं क्या करेंगे ?” उनसे इन छ: माहमें आत्मीयता निर्माण हो चुकी थी, मैंने उनसे कहा, “आप मुझसे अध्यात्म सीखना चाहती हैं; किन्तु मेरी एक भी बात नहीं मानती हैं, जैसे मैंने आपसे कहा, मेथीके पराठे बना लें, तो आपने कहा, मैं पराठे और आलूकी तरकारी(सब्जी) बना लेती हूं, जबकि मैंने आपको ऐसा इसलिए कहा था कि हम शीघ्र प्रसारके लिए निकल सकें ! संध्यामें मैंने कहा कि आप कुछ लोगोंको सत्संगकी सूचना जाकर दे दें तो आपने कहा बच्चोंको बोल देती हूं | वस्तुत: बच्चे बहुत छोटे हैं, वे लोगोंको ठीकसे सत्संगके विषयमें नहीं बता सकते हैं, यह आपको मैं पहले भी बता चुकी हूं; किन्तु आप यह छोटी सी बात नहीं समझ पाती हैं, जो गुण आपको अपने बच्चोंमें डालना है, उसे सर्वप्रथम अपने भीतर डालना होगा तो ही वो गुण उनमें आ सकता है ! जब आपमें आज्ञापालनका गुण नहीं है तो वह आपके बच्चोंमें नहीं आ सकता है !” तो वे थोडी लज्जित हुईं और कहा कि अबसे ऐसा प्रयास करेंगी | ये महिला मेरी एक भी बात नहीं मानती थीं, ऐसा नहीं कि वे मुझसे प्रेम नहीं करती थीं; किन्तु बुद्धिका अनावश्यक उपयोग बहुत अधिक करती थीं व उन्हें मनमानी करनेकी वृत्ति थी, हम साधक अध्यात्मके सिद्धांतका पालनकर, ऐसी स्थितिमें परेच्छासे वर्तनकर स्थितिको संभाल लेते हैं या उसी परिस्थितिमें स्वयंको ढाल लेते हैं; किन्तु उनके दोष वैसे ही रह जाते हैं |
यह प्रसंग मैं क्यों साझा कर रही हूं ?; क्योंकि अनेक पालक अपने बच्चोंके दुर्गुणोंकी परिवाद मुझसे करते हैं; किन्तु उनमें वे दुर्गुण भी होते हैं, यह उन्हें ध्यानमें नहीं आता है ! पालको, बच्चे अनुकरणप्रिय होते हैं; इसलिए बच्चोंसे आदर्श वर्तन चाहते हैं तो स्वयं आदर्श वर्तन करना सीखें !
Leave a Reply