मार्च ६, २०१९
अयोध्या भूमि विवादमे पक्षकार हिन्दू महासभाने बुधवार, ६ मार्चको उच्चतम न्यायालयमें यह कहा कि वह विवाद सुलझानेके लिए किसी भी प्रकारकी मध्यस्थताके लिए सज्ज नहीं है । महासभाने पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठसे दशकों प्राचीन ‘बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद’ अभियोगमें निर्णय सुनानेकी मांग करते हुए कहा, “हमारे लिए यह भावनात्मक प्रकरण है ।”
महासभाने कहा कि पक्षकारोंकी ओरसे निर्णयके लिए १९५० से प्रतीक्षा की जा रही है । उन्होंने कहा, “यह देवताकी सम्पत्ति है और इसमें मध्यस्थताके लिए किसीको अधिकार नहीं है ।”
हिन्दू महासभाकी ओरसे रखी गई इन बातोंपर न्यायाधीश एस.ए. बोबडेने कहा, “क्या आप इस पूरे मुद्देपर पहले ही निर्णय नहीं कर रहे हैं । आप यह कह रह हैं कि बिना प्रयासके ही यह विफल है । हम यह मानते है कि ऐसा उचित नहीं है ।”
उच्चतम न्यायालयने कहा कि वह विवादकी गम्भीरता और देशकी राजनीतिपर इस मध्यस्थताके परिणामका प्रभाव जानता है । प्रकरण केवल सम्पत्तिका नहीं है, वरन यह भावनाओं और आस्थासे भी जुडा है ।
संविधान पीठके अन्य सदस्योंमें न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर सम्मिलित हैं ।
पीठने कहा, ”मुगल शासक बाबरने क्या किया और उसके पश्चात क्या हुआ ?, हमें इससे लेना-देना नहीं है । वर्तमान समयमें क्या हो रहा है ?, हम बस इसीपर विचार कर सकते हैं । शीर्ष न्यायालय विचार कर रही है कि क्या इस विवादको मध्यस्थताकेद्वारा सुलझाया जा सकता है ?
“उचित है कि न्यायालयको बाबरसे कोई लेना-देना नहीं है; परन्तु समय २१ शताब्दीका है तो इस आधारपर सत्यको परिवर्तितकर मन्दिरकी भूमिको मस्जिदके लिए नहीं दिया जा सकता है ! बाबरने मन्दिर तोडकर मस्जिद बनाई थी, यह सर्वविदित है और खुदाईमें भी राम मन्दिरके स्पष्ट चिह्न उजागर हुए हैं तो वह भूमिका कुछ भाग मस्जिदका किसप्रकार है ?, यह न्यायालय स्पष्ट करें ! क्या वर्तमान समय है, यह सोचकर भारतमें मस्जिदोंका स्थान छोडकर वहां मन्दिर बनाने दिए जा सकते हैं ? सम्भवतः नहीं तो हिन्दुओंको अपनी प्रत्येक धर्मस्थलीको मस्जिदके साथ क्यों बांटना चाहिए ? न्यायालय निर्णय दें, मध्यस्थ बनाने थे तो उन तथ्यों और साक्ष्योंका क्या आधार था, जो आजतक एकत्र किए गए ?”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : लाइव हिन्दुस्तान
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