ब्रह्मचर्य-आश्रम क्या है ?
ब्रह्मचर्य-आश्रम :
ब्रह्मचर्यका अर्थ होता है ब्रह्मको चरना या ब्रह्मकी चर्चा व चर्चामें ही रत रहना । दूसरा अर्थ जो प्रचलित है वह है इंद्रियोंका संयम रखना । विद्यार्थी और संन्यासीका यह कर्तव्य है कि वह इंद्रियोंपर संयम रखकर ईश्वर परायण
रहे ।
ब्रह्मचर्यका मूलत: अर्थ ब्रह्मको (ईश्वरको) जानना । ब्रह्मको जाना जाता है, योग्य प्रकारकी साधनासे आत्मज्ञानी गुरुसे जो सीखा जा सकता है, वे वेदाध्ययन या शास्त्राभ्यास कराते है या सिखाते है एवं इसके लिए उनका सान्निध्य परम आवश्यक होता है । यही ऋषि ऋण है और यही ब्रह्मयज्ञ भी । ब्रह्मको जाननेसे ऋषि ऋण चुकता होता है और ब्रह्मयज्ञ सम्पन्न होता है और इसीसे मनुष्य जीवनकी सार्थकता सिद्ध होती है । यही चार पुरुषार्थका प्रथम अंग धर्म है और तीनों आश्रमका आधार है ।
आचार्य सुश्रुतके अनुसार, २५ वर्ष आयुके पुरुषके समतुल्य १६ वर्षीया कन्या होती है। इस आयुमें दोनोंका शारीरिक और मानसिक विकास समतुल्य होता है । – (सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान १.३५.१३)
ब्रह्मचर्य ३ प्रकार का होता है:
१. कनिष्ठ : जिस प्रकार २४ अक्षरोंका गायत्री छन्द होता है, उसी प्रकार २४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले पुरुषको वसु ब्रह्मचारी कहते हैं । यह कन्याओंका १६ वर्ष पर्यन्त लागू होता है । जो इतने समय तक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वेदादि विद्या और सुशिक्षाका ग्रहण करे, तो उसके शरीरमें प्राण बलवान होकर सब शुभगुणोंके वास करानेवाले होते हैं।
२. मध्यम : जिस प्रकार ४४ अक्षरोंका त्रिष्टुप छन्द होता है, उसी प्रकार ४४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले पुरुषको रूद्र ब्रह्मचारी कहते हैं । कन्याओंका २२ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समयतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वेदाभ्यास करता है, उसके प्राण, इन्द्रियां, अन्तःकरण और आत्मा बलयुक्त होकर सब दुष्टोंको रुलानेवाले और श्रेष्ठोंका पालन करनेवाले होते हैं ।
३. उत्तम : जिस प्रकार ४८ अक्षरोंका जगती छन्द होता है, उसी प्रकार ४८ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले पुरुषको आदित्य ब्रह्मचारी कहते हैं । कन्याओंका २४ वर्ष पर्यन्त । जो इतने समयतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वेदाभ्यास करता है, उसके प्राण, इन्द्रियां, अन्तःकरण अनुकूल होकर आत्मा सकल विद्याओंसे युक्त हो जाता है ।
२४ वर्ष आयुकी समाप्तिसे पूर्व पुरुषको और १६ वर्ष आयुसे पूर्व कन्याको विवाह नहीं करना चाहिए । ४८ वर्ष आयुके पश्चात पुरुषको और २४ वर्षकी आयुके पश्चात कन्याको ब्रह्मचर्य नहीं रखना चाहिए । किन्तु यह नियम विवाह करनेवाले पुरुष और कन्याओंके लिए है और जो विवाह करना ही न चाहें वे मरणपर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकते हों, तो भले ही रहे, परन्तु यह सामर्थ्य पूर्ण विद्यावाले जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी स्त्री-पुरुषोंका है ।
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