एक बार मेरे एक परिचितने, जो मुझसे आयुमें दस वर्ष बडे थे, अकस्मात मुझसे मिले और मिलते ही मुझे झुककर चरण स्पर्श किया, मैं इसके लिए तैयार नहीं थी और इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती थी, और उनके उस वर्तनसे मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, मैंने उनसे कहा, “आप मुझसे आयुमें बडे हैं, आपको इसप्रकार मुझे प्रणाम नहीं करना चाहिए, यह अनुचित कृत्य है !” उन्होंने कहा, “मैं आपके समान किसी सन्तके शरणमें साधना नहीं कर सकता हूं; क्योंकि मुझे ज्ञात है कि सन्त हमारे अहंपर वार करते हैं और मुझमें अहं अधिक है; इसलिए उनके शरणमें रहकर साधना करना मेरे लिए कठिन है; किन्तु आप इतने वर्षोंसे ऐसा कर रही हैं, मैंने आपको इसलिए प्रणाम किया ! मैंने उनसे कहा, “आपको यह ज्ञात होना कि आपमें अहं बहुत है, यह ध्यानमें आना ही अंतर्मुखताका एक महत्त्वपूर्ण चरण है । अपनी भक्ति बढायें, ईश्वर आपकी निश्चित ही सहायता करेंगे ।”
वैसे उन्होंने बात बिलकुल ही सही कही थी, अहंकारी व्यक्ति किसी सन्तके शरणमें कभी भी साधना नहीं कर सकते हैं; क्योंकि ईश्वर समान संतोंका भी मुख्य आहार अपने शिष्योंका अहंकार ही होता है !
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