क्या कलियुगमें समद्रष्टा सन्त होते हैं?


एक पाठकने लिखा है कि कलियुगमें समद्रष्टा सन्त होते ही नहीं हैं !

वस्तुत: कलियुगके कालमें यह धरा मात्र और मात्र ऐसे सन्तोंके कारण ही टिकी है ! कलियुगमें एक नहीं, अनेक समद्रष्टा सन्त हुए हैं । किन्तु ऐसे सन्तोंसे मिलना भी एक प्रकारसे ईश्वरीय कृपा ही है; इसलिए सन्त तुलसीदासने लिखा है, ‘बिनु हरिकृपा मिले न संता’ !

जब मैंने अपने श्रीगुरुको प्रथम बार देखा था तो मुझे उनके नेत्रोंमें इतनी पारदर्शकता दिखी थी कि मैं उससे अभिभूत हो गई थी, उनके नेत्रोंमें महासागर जैसी गहराई थी और उसमें अंशमात्र भी वासना नहीं थी, उसके आर-पार जैसे मैं देख सकती थी !

उनसे मिलनेसे पूर्व मैं भगवानजीसे, मुझे गुरुप्राप्ति हो, इस हेतु बडी उत्कंठासे प्रार्थना किया करती थी और मैंने भगवानजीसे रामकृष्ण परमहंस जैसे ही उच्च आध्यात्मिक स्तरके गुरु मुझे मिलें, ऐसी प्रार्थना करती थी या यूं कहूं कि मेरे पास एक रामकृष्ण परमहंसकी मुख्यपृष्ठपर चित्रवाली पुस्तक थी, मैं उसीको हाथमें लेकर कभी भगवानजीसे तो कभी उनसे आर्ततासे प्रार्थना करती थी; क्योंकि मैंने उनके विषयमें अभ्यास किया था, मुझे ज्ञात था कि वे समद्रष्टा थे और ऐसे सन्त तो ईश्वर जैसे ही होते हैं !  जब मैंने अपने श्रीगुरुको देखा तो मुझे उनके नेत्र भी रामकृष्ण परमहंस जैसे ही दिखे ! मैं आज भी उस दृश्यको नहीं भूल सकती और उसे मात्र सोचकर परम शान्तिकी गहराईमें चली जाती हूं ! समद्रष्टा कैसे होते हैं ?, यह तो मैं उस समय नहीं जानती थी; किन्तु उनके नत्रोंकी मौन भाषाने मुझ जैसी अहंकारीको तत्क्षण शरणागत कर दिया था और आजतक मैं उसी मुद्रामें हूं !

  मेरे श्रीगुरुके स्थूल सान्निध्यमें दस वर्ष रही और अनेकों बार उन्होंने अपने समद्रष्टा होनेकी अनुभूति इस निकृष्ट जीवको देकर निहाल कर दिया ! उनके मनमें किसीके लिए भी भेदभाव नहीं है, स्त्री-पुरुष, हिन्दू-अहिन्दू, देव-असुर, मानव-पशु, वे सबसे एक समान बर्ताव करते हैं। सबके लिए एक समान निर्मल प्रेम और सबके लिए निष्काम सेवा !

मई १९९७ में मेरे पिताजीको जब मैंने श्रीगुरुसे मिलनेकी अपनी अनुभूति बतायी थी, तो वे मेरी सब बातें सुनकर भावविभोर होकर दूरभाषपर ही कहने लगे, “बेटा, तेरे पूर्वसंचित जागृत हो गए, कितने भाग्यशाली हो आप जो ऐसे उच्च कोटिके  सन्तके दर्शन और सत्संगका सौभाग्य प्राप्त हुआ है आपको ।” मैंने उनसे पूछा, “आपको कैसे पता वे उच्च कोटिके हैं ?,” उन्होंने कहा, “तुम्हारे बतानेसे ही मेरे हृदयमें आनन्दकी हिलोरे उठ रही हैं, जिनके विषयमें सुनकर इतना आनंद हो रहा है, वे निश्चित ही सत्चितानंद स्वरूप होंगे, आपका जन्म सार्थक हो गया, उनके चरण कभी मत छोडना, देखो मैं अभागा आज भी गुरुके लिए तरस रहा हूं । किन्तु मेरे सर्वज्ञ श्रीगुरुने एक वर्ष पश्चात ही मेरे पिताजीको अपने दर्शन और सत्संग देकर उनकी वर्षोंसे तडपती आत्माको शान्ति प्रदान की । वे उस दिन बहुत प्रसन्न थे ! उनकी अनुभूतियां भी बहुत दिव्य थीं ।

सन्त हमें ऐसे नहीं मिलते हैं, यदि मिल जाएं और हमारे पूर्व संचितमें पुण्य कर्म न हों तो हम उनका अभिज्ञान नहीं कर सकते हैं ! और समद्रष्टा मिल जाएं, तो समझ लें आपका उद्धार हो गया !

इस लेखको लिखते समय भी मेरा ध्यान लग रहा था ! ऐसे होते हैं समद्रष्टा सन्त !



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