मस्जिदोंमें महिलाओंको मिले नमाज पढनेकी आज्ञा, याचिकापर उच्चतम न्यायालयकी केन्द्रको अधिसूचना !


अप्रैल १६, २०१९


उच्चतम न्यायालयने मस्जिदोंमें मुस्लिम महिलाओंको नमाज पढनेकी आज्ञाके लिए प्रविष्ट याचिकापर मंगलवार, १६ अप्रैलको केन्द्रको अधिसूचना (नोटिस) दी । न्यायमूर्ति एस.ए.बोबडे और न्यायमूर्ति एस.अब्दुल नजीरकी पीठने पुणे निवासी एक दम्पतिकी याचिकापर केन्द्रको अधिसूचना जारी की । पीठने स्पष्ट किया कि वह सबरीमला मंदिर प्रकरणमें उच्चतम न्यायालयके निर्णयके कारण ही इस याचिकाकी सुनवाई करेगी ।

पीठने याचिकाकर्ताके अधिवक्तासे कहा, ”हम केवल सबरीमला मंदिर प्रकरणमें हमारे निर्णयके कारण ही आपको सुन सकते हैं ।” तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्राकी अध्यक्षतावाली पांच सदस्यीय संविधान पीठने २८ सितंबर, २०१८ को ४:१ के बहुमतके निर्णयमें केरलमें स्थित सबरीमला मंदिरमें सभी आयु वर्गकी महिलाओंके प्रवेशका मार्ग प्रशस्त कर दिया था । पीठने कहा था कि मन्दिरमें प्रवेशपर किसी भी प्रकारका प्रतिबन्ध लैंगिक भेदभावके समान है ।

मुस्लिम महिलाओंको नमाज पढनेके लिए मस्जिदमें प्रवेशकी अनुमति हेतु याचिका प्रविष्ट करनेवाले दम्पतिने मस्जिदोंमें महिलाओंके प्रवेशपर प्रतिबन्धको अवैधानिक और ‘असंवैधानिक घोषित करनेका अनुरोध किया है ।

याचिकामें कहा गया है कि गरिमाके साथ जीना और समता सबसे अधिक पवित्र मौलिक अधिकार है और किसी भी मुस्लिम महिलाके मस्जिदमें प्रवेश करनेपर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता । याचिकापर सुनवाईके समय पीठने याचिकाकर्ताके अधिवक्तासे जानना चाहा कि क्या विदेशोंमें मुस्लिम महिलाओंको मस्जिदमें प्रवेशकी आज्ञा है । इसपर याचिकाकर्ताके अधिवक्ताने कहा कि मुस्लिम महिलाओंको पवित्र मक्काकी मस्जिद और कनाडामें भी मस्जिदमें प्रवेशकी अनुमति है ।

यद्यपि, पीठने अधिवक्तासे प्रश्न किया कि क्या आप संविधानके ‘अनुच्छेद-१४’का आश्रय लेकर दूसरे व्यक्तिसे समानताके व्यवहारका दावा कर सकते हैं । याचिकाकर्ताओंके अधिवक्ताने कहा कि भारतमें मस्जिदोंको शासनसे लाभ और अनुदान मिलते हैं ।

 

“न्यायालय कह रहा है कि केवल इस आधारपर याचिका सुनी जा रही है कि हमने सबरीमालापर निर्णय सुनाया था । क्या यदि सबरीमालापर निर्णय नहीं सुनाया होता तो इसकी सुनवाई भी न होती ! अर्थात हिन्दुओंके विषयमें बिना सन्दर्भ छेडछाड की जा सकती है और अन्योंके विषयमें तबतक नहीं की जा सकती, जबतक उसी सन्दर्भमें हिन्दुओंके विरुद्ध निर्णय न दिया हो ! अर्थात संविधानकी एक धारा जब लागू होगी, जब वह हिन्दुओंपर लागू न हो जाए ! यह कैसी व्यव्स्था है ?; परन्तु अब जैसा भी है देखना यह होगा कि न्यायालय क्या महिलाओंको प्रवेश की अनुमति देता है या नहीं ?; क्योंकि न्यायालय यह स्पष्ट कर चुका है कि लैंगिक आधारपर भेदभाव नहीं होना चाहिए तो आशा है कि यहां भी लैंगिक आधारपर भेदभाव नहीं होगा !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : ऑप इण्डिया



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