अप्रैल १७, २०१९
केरलके सुन्नी मौलानाओं और इस्लामिक विद्वानोंके प्रभावशाली संगठन ‘समस्त केरला जमीयतुल उलमा’ने महिलाओंके मस्जिदमें प्रवेशपर प्रतिबन्धको लेकर कहा है कि मुस्लिम महिलाओंको अपने घरके भीतर ही नमाज पढनी चाहिए । संगठनने कहा कि वह अपने धार्मिक प्रकरणमें न्यायालयका हस्तक्षेप स्वीकार नहीं कर सकती है । संगठनके महासचिव के. अलीक्कूटी मुसलियरने कहा, “हम धार्मिक प्रकरणमें न्यायालयके हस्तक्षेपको स्वीकार नहीं कर सकते हैं । हमें अपने धार्मिक नेताओंके निर्देशोंको मानना चाहिए ।” मुसलियरका यह वक्तव्य महिलाओंको मस्जिदमें प्रार्थनाकी अनुमति देनेके लिए उच्चतम न्यायालयद्वारा याचिकाको स्वीकार करनेके पश्चात आया है ।
मुसलियरने कहा कि उनके संगठनने सबरीमालामें महिलाओंके प्रवेशपर भी इसीप्रकारका रवैया अपनाया था । उन्होंने कहा कि मस्जिदमें केवल पुरुषोंको ही नमाज पढनी चाहिए । मुसलियरने कहा, “मस्जिदमें महिलाओंके प्रवेशको लेकर नियम नूतन नहीं है । यह नियम गत १४०० वर्षोंसे अस्तित्वमें है । पैगंबर मोहम्मद साहबने भी इस सम्बन्धमें अपना स्पष्टीकरण दिया था ।”
उल्लेखनीय है कि पुणेके मुस्लिम दम्पतीने न्यायालयमें मुस्लिम महिलाओंके मस्जिदमें प्रवेशको लेकर याचिका प्रविष्ट की थी । याचिकामें कहा था कि मुस्लिम महिलाओंको भी मस्जिदमें प्रवेश और प्रार्थनाका अधिकार मिले ।
“सबरीमालामें महिलाओंके प्रवेशका अपना ठोस आधार है कि भगवान अयप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं तो प्रवेशकी अनुमति नहीं है, ऐसे कुछ मन्दिर भी हैं, जहां पुरुषोंके प्रवेशकी अनुमति नहीं है; शेष अनेक मन्दिरोंमें महिला व पुरुष दोनोंको अनुमति है; परन्तु मुसलमान मानते हैं कि अल्लाहका कोई रूप नहीं है तो मस्जिदमें प्रवेशका अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए ?, इसके पीछे क्या तर्क है, जो वे दे सकते हैं ? मुसलमान तर्क दे अथवा न दे; परन्तु इस प्रकरणमें न्यायालय, केरलका तथाकथित धर्मनिरपेक्ष व नारीवादी शासन, महिला आयोग व समाज सुधारिकाएं सभीके सभी मौन हैं ! ऐसा क्यों है, यह बतानेकी आवश्यकता नहीं है ? सबरीमालाके प्रकरणमें चिल्लाकर बोलनेवालोंका नारीके अधिकारोंसे कोई लेना देना नहीं था, उनका उद्देश्य तो मात्र हिन्दुओंकी आस्थाको आघात करना है, उनके धर्मस्थलोंकी सात्त्विकताको नष्ट करना है, कमसे कम इस प्रकरणसे तो यही स्पष्ट होता है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ऑप इण्डिया
Leave a Reply