मार्च २०, २०१९
उच्चतम न्यायालयमें शनिवार, २० अप्रैलको एक भिन्न प्रकारके प्रकरणकी सुनवाई हुई । मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोईपर लगे यौन शोषणके आरोपोंपर सुनवाई हुई ।
गोगोईने उनपर लगे आरोपोंको अस्वीकृत कर दिया । यद्यपि, उन्होंने इसकी सुनवाईके लिए एक पीठका गठन किया है और स्वयंको इससे पृथक कर लिया है । इसके साथ ही उन्होंने इसप्रकारके आरोपोंको न्यायपालिकाके विरुद्घ षडयन्त्र बताते हुए न्यायपालिकाको संकटमें बताया ।
बता दें कि गोगोईपर उच्चतम न्यायालयकी ही एक पूर्व कर्मचारीने यौन शोषणका आरोप लगाया है । न्यायालयने इसमें सुनवाई करते हुए कहा कि इसप्रकारके आरोप न्यायपालिकाकी स्वायत्तताके विरुद्ध षडयन्त्र हैं ।
सुनवाईके मध्य मुख्य न्यायाधीशने कहा कि उनपर लगे आरोप अविश्वसनीय हैं । उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता है कि मैं इतने निचले स्तरतक भी नहीं जा सकता कि ऐसे आरोपोंको अस्वीकार करूं । इस सबके पीछे कोई बडी शक्ति है । वे मुख्य न्यायाधीशके अधिकारीको कलंकित करना चाहते हैं ।
गोगोईपर आरोप लगानेवाली पूर्व कर्मचारीने दो अवसरका वर्णन किया है । यह दोनों घटनाएं अक्टूबर २०१८ की हैं । इससे एक दिवस पूर्व ही गोगोई देशके मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए थे । न्यायालयके सेक्रेटरी जनरल संजीव सुधाकर कलगांवकरने कहा, “महिलाद्वारा लगाए गए सभी आरोप दुर्भावनापूर्ण और निराधार हैं ।”
महा न्यायभिकर्ता (सालिसिटर जनरल) तुषार मेहताके आग्रहपर शनिवार, २० अप्रैलको इस प्रकरणमें तत्काल सुनवाई की गई । न्यायालयने प्रकरणको न्यायपालिकाकी स्वायत्ताके लिए महत्वपूर्ण बताते हुए सुनवाई की । इस प्रकरणमें न्यायालयने कहा कि वह पत्रकारितापर रोक नही लगा रहे हैं; परन्तु आशा करते हैं कि मीडिया तथ्योंको जांचे बिना इसप्रकारके न्यायपालिकाको लक्ष्य बनानेवाले नकली आरोप नहीं छापेगा और उत्तरदायित्वसे काम करेगा ।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोईने कहा कि कोई भी मेरा खाता देख सकता है । न्यायाधीशके रूपमें २० वर्षोंकी निस्वार्थ सेवाके पश्चात मेरे बैंक खातेमें ६.८० लाख रुपये हैं । क्या मेरे २० वर्षोंके कार्यकालका यह पारितोषिक है ।
“सम्भवतः न्यायपालिकाको अब संकट दिख रहा है; क्योंकि आरोप मुख्य न्यायमूर्तिपर लगा है और जांच भी वहीं कर रहे हैं !! हम यह नहीं कह रहे कि गोगोईजी दोषी है; परन्तु न्यायपालिकापर यह संकट तब क्यों नहीं आया था, जब जीवन पर्यन्त अपना सब कुछ देनेके पश्चात खातेमें शून्य धन रखनेवाले साधु-सन्तोंकी खुलेमें चीख-चीखकर अवज्ञा की गई, उसमें न्यायालय भी थे और समाचार माध्यम भी । दोषी न होते हुए भी जयनेन्द्र सरस्वतीजी जैसे महापुरुष और अन्य वृध सन्तोंपर किसी भी प्रकारसे दोष मढ दिया गया, फिर वह दुष्कर्मका हो या आतंकवादी होनेका ! साध्वी प्रज्ञा कुछ दिनोंसे इसी बातको उजागर कर रही थी कि बिना आधारपर उन्हें बन्दी बनाकर दिन-रात प्रताडित किया गया ताकि किसी भी प्रकारसे वह अपना दोष स्वीकार कर लें, जो उन्होंने किया ही नहीं और अब यह ‘एनआइए’ने भी कहा है तो यह विधान दो व्यक्तियोंके लिए भिन्न क्यों ? न्यायालयको यह संकट अब क्यों दिख रहा है ? क्यों उसी प्रकार मीडिया और न्यायलय ट्रायल न चलें । क्यों बिना आरोप सिद्ध हुए कारावसमें रखकर प्रताडित न किया जाए ? क्या इसका उत्तर कोई दे सकता है ? सम्भवतः नहीं; क्योंकि पट्टी न्यायपालिकाकी नहीं, हमारे नेत्रोंपर बंधी है, जो कुछ देखना ही नहीं चाहती ! आशा करते हैं, गोगोईजी निर्दोष ही हो; परन्तु इस अन्यायपूर्ण व्यव्सथाको अब परिवर्तनकी आवश्यकता है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जागरण
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