मई ६, २०१९
उच्चतम न्यायालयके मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोईद्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समितिने उन्हें निर्दोष बताया है । जांच समितिको न्यायमूर्ति रंजन गोगोईके विरुद्ध उच्चतम न्यायालयकी पूर्व कर्मचारीद्वारा लगाए गए यौन शोषणके आरोपोंका कोई साक्ष्य नहीं मिला । इस समितिका नेतृत्त्व न्यायाधीश एसए बोडबे कर रहे थे । उन्होंने बताया कि समितिका जांच ब्यौरा मुख्य न्यायाधीश एवं दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशको दे दिया गया है । चूंकि यह एक अनौपचारिक जांच थी; इसीलिए इस जांच ब्यौरेको सार्वजनिक नहीं किया जाएगा ।
बता दें कि २० अप्रैलको कई समाचार माध्यमोंद्वारा प्रकाशित समाचारमें उच्चतम न्यायालयकी पूर्व कर्मचारीद्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोईपर यौन शोषणके आरोप लगानेकी बात कही गई थी । उक्त महिला कर्मचारी यायाधीश गोगोईके आवास स्थित कार्यालयमें कार्यरत थीं । उस महिलाद्वारा २२ न्यायाधीशोंको दिए गए शपथ-पत्रके (एफिडेविटके) आधारपर ये आरोप लगाए गए थे । उसमें महिलाने यौन शोषणकी दो घटनाओंका वर्णन किया था । महिलाका आरोप था कि जब उन्होंने यह सब करनेसे मना किया, तब उन्हें चाकरीसे (नौकरीसे) निकाल दिया गया ।
“जिसपर दोष लगा, उन्होंने जांचके लिए समिति बनाई और उनकी बनाई समितिने उन्हें निर्दोष सिद्ध कर दिया गया !! अर्थात अब न्यायमूर्ति दोषी नहीं माने जाएंगें ! क्या यहीं कार्यवाही हिन्दू सन्तोंपर लगे आरोपोंके प्रकरणमें नहीं हो सकती है ? कि सन्तोंपर आरोप लगनेपर वही सन्त अपने तीन शिष्योंको बैठाकर उसकी जांचके लिए कहे; परन्तु नहीं, हिन्दू सन्तोंको पहले कारावासमें डाला जाता है, उन्हें बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता ! और ५-६ वर्षों पश्चात न्यायालय अपना निर्णय देता है ! इस प्रकरणमें जांचका आधार क्या था ? किन तथ्योंकी जांच की गई ? जांच ब्यौरा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाएगा ? ये सभी तथ्य अवश्य ही सन्देहास्पद है । ये सबके समक्ष उजागर होने चाहिए थे । इससे हमारी तथाकथित न्यायव्यवस्थाका बोध होता है और जो न्याय स्वयं ही पंगु हो, वह साधारणजनको क्या न्याय देगा !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ऑप इण्डिया
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