जून १, २०१९
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनने जीवनदायिनी गंगा नदीके प्रदूषणको रोकनेके लिए कोई भी पग न उठानेपर बिहार, झारखण्ड और बंगाल शासनको फटकार लगाई है । साथ ही एनजीटीने इन तीनों राज्योंपर २५ लाख रुपएका अर्थदण्ड (जुर्माना) भी लगाया है ।
एनजीटीने कहा है कि गंगाकी स्वच्छताके लिए बिहारमें कोई कार्य नहीं हुआ है । वहांपर एक भी सीवेज परियोजना अभीतक पूर्ण नहीं हुई है । इसीप्रकार बंगालने २२ मेंसे केवल तीन परियोजनाओंपर कार्य किया है । एनजीटीकी खण्डपीठका कहना है कि बंगाल, बिहार और झारखण्डने ट्रिब्यूनलके आदेशके पश्चात अपना प्रतिनिधित्व देना आवश्यक नहीं समझा । हम राज्योंके ऐसे व्यवहारको अस्वीकार करते हैं । इतने गंभीर प्रकरणमें ऐसी असंवेदनशीलता निश्चित रूपसे चिंताका विषय है ।
खण्डपीठने कहा कि हम इन तीनों राज्योंको २५-२५ लाख रुपएका अर्थदण्ड भरनेका आदेश देते हैं । यह अन्तरिम धनराशि गंगाकी निरन्तर हो रही दुर्गतिके कारण देना है ।
एनजीटीने यह भी कहा कि अपशिष्टका नदीमें गिरना एक आपराधिक कृत्य है । साथ ही उत्तर प्रदेश शासनको आंशिक रूपसे अनुमति देनेके स्थानपर औद्योगिक प्रदूषणको बंद करनेका निर्देश दिया । एनजीटीने कहा कि वह सीपीसीबीको धन उपलब्ध करा रही है, ताकि उत्तरप्रदेश शासन कानपुर देहात, खानपुर और राखी मंडीके क्रोमियम डम्पका शोधन किया जा सके । एनएमसीजीकी ओरसे नरोरा पुलपर पर्याप्त ई-फ्लो भी सुनिश्चित करना है । इसके अतिरिक्त उत्तरप्रदेशको उत्तराखण्डकी ही भांति युद्धस्तरपर अतिक्रमण हटाकर क्षेत्रको रिक्त कराना होगा ।
ट्रिब्यूनलने कहा कि उत्तरप्रदेशके मुख्य सचिवको निजी रूपसे इस प्रकरणकी देखरेख करनी होगी और गंगामें प्रदूषणके विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’की नीती अपनानी होगी ।
“गंगा नदीको स्वच्छ करनेके लिए इच्छा शक्तिकी आवश्यकता है, जो आजके शासकगणोंमें नहीं है । कुछ शासकगण तो नदीको भी हिन्दू और मुस्लिममें विभाजितकर उसपर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो कुछ अकर्मण्यताके कारण । शासकगणोंके कार्योंको देखकर लगता है कि अब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके उपरान्त ही गंगा नदीकी स्वच्छता हो पाएगी ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जागरण
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