उपनाम और गोत्र ज्ञात होनेका महत्व !


जैसे आजकल अनेक स्त्रियोंको अपने पतिका उपनाम धारण करनेमें लज्जा आती है या उनके अहंको ठेस पहुंचती हैं, वैसे ही आजकल अनेक पुत्र भी ऐसे ही कुछ कारणोंसे अपने पिताका उपनाम त्याग देते हैं ! हमारे यहां कहते हैं पुत्र पिताके कुलाका नाम आगे बढाता है; किन्तु आजके पुत्रको (कुपुत्र कहना अधिक उचित होगा) अपने पिताके उपनाम रखनेमें भी आपत्ति होती है ! पिताका उपनाम नाम जातिसूचक होता है, यह सोचकर भी कुछ पुत्र लज्जावश अपने कुलके उपनामका त्याग करते हैं ! हम जाति प्रथाके समर्थक नहीं हैं; किन्तु उपनाम और गोत्रका नाम ज्ञात रहनेसे, आपके पश्चात आनेवाली पीढीके आपके वंशज अपने पूर्वजोंका नाम, मूल स्थान, कुलदेवी इत्यादि ज्ञात कर सकते हैं, जो हम हिन्दुओंके धार्मिक अनुष्ठानोंके यशस्वी होने हेतु आवश्यक तथ्य हैं ।  एक बातका सभी ध्यान रखें कि हिन्दू धर्ममें भेदभाव या छुआछूत कभी नहीं था, यह तो धर्मके पतन होनेके साथ एवं मलेच्छोंके आक्रमणके साथ आरम्भ हुआ है ! हमारे यहां तो अनेक यज्ञकर्म, नाई, कुम्भार इत्यादिके सहयोगके बिना तो पूर्ण ही नहीं हो सकता है | इसलिए अपनी जातिपर न अहं करें और न ही घृणा क्योंकि ईश्वरप्राप्तिका अधिकार हमारे समाजमें सबको है, मीरा बाई (क्षत्रिय रानी) सदनाजी (कसाई), कबीर(बुनकर) रयदास(चर्मकार) जैसोंने भी सन्त पदको प्राप्त कर, इस तथ्यकी पुष्टि की है और साथ ही योग्यता व त्यागके आधारपर ही यहां सबको सम्मान मिलता रहा है और हिन्दू राष्ट्रमें भी ऐसा ही होगा | 



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